निबन्ध | Essay

‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ – भारतेंदु हरिश्चंद्र

‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ – भारतेंदु हरिश्चंद्र आज बड़े आनंद का दिन है कि छोटे से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को एक बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं। इस अभागे Read more…

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‘पंच महाराज’ – बालकृष्ण भट्ट

‘पंच महाराज’ – बालकृष्ण भट्ट माथे पर तिलक, पाँव में बूट चपकन और पायजामा के एवज में कोट और पैंट पहने हुए पंच जी को आते देख मैं बड़े भ्रम में आया कि इन्‍हें मैं Read more…

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खड़ी बोली में प्रथम सफल कविता आप ही कर सके हैं।

‘कविवर श्री सुमित्रानन्दन पन्त’ – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ “मग्न बने रहते हैं मोद में विनोद में क्रीड़ा करते हैं कल कल्पना की गोद में, सारदा के मन्दिर में सुमन चढ़ाते हैं प्रेम का ही पुण्यपाठ Read more…

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‘आचरण की सभ्यता’ – सरदार पूर्ण सिंह

‘आचरण की सभ्यता’ – सरदार पूर्ण सिंह विद्या, कला, कविता, साहित्‍य, धन और राजस्‍व से भी आचरण की सभ्‍यता अधिक ज्‍योतिष्‍मती है। आचरण की सभ्‍यता को प्राप्‍त करके एक कंगाल आदमी राजाओं के दिलों पर Read more…

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‘जी’ – बालकृष्ण भट्ट

‘जी’ – बालकृष्ण भट्ट साधारण बातचीत में यह जी भी जी का जंजाल सा हो रहा है। अजी बात ही चीत क्‍या जहाँ और जिसमें देखो उसी में इस जी से जीते जी छुटकारा नहीं Read more…

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‘समय’ – बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’

‘समय’ – बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ काव्यशासस्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम। व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥ यह विख्यात है कि त्रिभुवन में विजय की पताका फहराने वाला, अपने कुटिल कुत्सित परिवार से ब्राह्मणों को दुःख Read more…

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निबन्ध: ‘पेट’ – प्रतापनारायण मिश्र

‘पेट’ – प्रतापनारायण मिश्र इन दो अक्षरों की महिमा भी यदि अपरंपार न कहिए तौ भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि बहुत बड़ी है। जितने प्राणी और अप्राणी, नाम रूप देखने सुनने में आते Read more…

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‘भय’ – रामचंद्र शुक्ल

‘भय’ – रामचंद्र शुक्ल किसी आती हुई आपदा की भावना या दुःख के कारण के साक्षात्‍कार से जो एक प्रकार का आवेगपूर्ण अथवा स्‍तंभ-कारक मनोविकार होता है उसी को भय कहते हैं। क्रोध दुःख के Read more…

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‘कुटज’ – हजारी प्रसाद द्विवेदी

ललित निबन्ध: ‘कुटज’ – हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्‍या। पूर्व और अपार समुद्र – महोदधि और रत्‍नाकर – दोनों को दोनों भुजाओं से थाहता हुआ Read more…

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‘गेहूँ बनाम गुलाब’ – रामवृक्ष बेनीपुरी

‘गेहूँ बनाम गुलाब’ – रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं – Read more…

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‘धोखा’ – प्रतापनारायण मिश्र

‘धोखा’ – प्रतापनारायण मिश्र इन दो अक्षरों में भी न जाने कितनी शक्ति है कि इनकी लपेट से बचना यदि निरा असंभव न हो तो भी महा कठिन तो अवश्य है। जबकि भगवान रामचंद्र ने Read more…

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‘स्त्री: दान ही नहीं, आदान भी’ – महादेवी वर्मा

‘स्त्री: दान ही नहीं, आदान भी’ – महादेवी वर्मा संपन्न और मध्यम वर्ग की स्त्रियों की विवशता, उनके पतिहीन जीवन की दुर्वहता समाज के निकट चिरपरिचित हो चुकी है। वे शून्य के समान पुरुष की Read more…

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