कविताएँ | Poetry

कविता: ‘मैंने आहुति बन कर देखा’ – अज्ञेय

‘मैंने आहुति बन कर देखा’ – अज्ञेय मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा Read more…

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कहानी | Story

कहानी: ‘रोज’ (गैंग्रीन) – अज्ञेय

‘रोज’ (गैंग्रीन) – अज्ञेय दोपहर में उस सूने आँगन में पैर रखते हुए मुझे ऐसा जान पड़ा, मानो उस पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो, उसके वातावरण में कुछ ऐसा अकथ्य, अस्पृश्य, किन्तु Read more…

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कविताएँ | Poetry

मैं तुम्हें बताऊँगा अपनी देह का प्रत्येक मर्मस्थल..

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ प्रयोगवाद के कवि थे और अपने समकालीन कवियों से काफी अलग। उनकी कविताएँ और यहाँ तक कि कहानियाँ भी मनुष्य के बाहरी संघर्षों से साथ-साथ उसके आंतरिक द्वंद्वों को एक मनोवैज्ञानिक Read more…

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संस्मरण | Memoirs

संस्मरण: ‘वसंत का अग्रदूत’ – अज्ञेय

‘वसंत का अग्रदूत’ – अज्ञेय ‘निराला’ जी को स्मरण करते हुए एकाएक शांतिप्रिय द्विवेदी की याद आ जाए, इसकी पूरी व्यंजना तो वही समझ सकेंगे जिन्होंने इन दोनों महान विभूतियों को प्रत्यक्ष देखा था। यों Read more…

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