तक़सीम

'तक़सीम' - गुलजार (अनुवाद: शम्भू यादव)  जिन्दगी कभी-कभी जख्मी चीते की तरह छलाँग लगाती दौड़ती है, और जगह-जगह अपने पंजों के निशान…

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