Tag: Taslima Nasreen
और मत रखो अँधेरे में, देखने दो मुझे
मेरी इच्छा है कि सुबह से दोपहर, दोपहर से रात तक अकेली घूमती रहूँ। नदी के किनारे, गाँव के मैदान में, रोशनी में, शहर...
बदनसीब
मैं हूँ सिमटी-सिकुड़ी हुई
माघ की रात की एक वस्त्रहीन लड़की
जिसकी देह पर कपड़े नहीं हैं
अपनी कोमल उँगलियों को
मोड़कर रखती हूँ हथेलियों में।
नाच उठी थी...
