दुनिया में जब पहली बार किसी ने मोहब्बत की होगी तो उस मोहब्बत का इज़हार शायरी में ना हुआ होगा, यह बात मन को नहीं भाती। बातों ने मिसरों का रूप न लिया होगा, लफ़्ज़ बहर में न सिमटे होंगे, चेहरों में चाँद न चमके होंगे.. लेकिन यक़ीनन इज़हार का वो पूरा मंज़र ही वक़्त के फेर में एक इस्तिआरा बनकर एक शय में ढला होगा, जिसे आज हम नज़्म कहते हैं.. मोहब्बत की नज़्म। ऐसे ही कुछ दिलनशीं मंज़र तसनीफ़ हैदर की मोहब्बत की नज़्मों के पहले दौर में पढ़ने को मिले जिन्हें चार हिस्सों में यहाँ शेयर किया जा रहा है। तसनीफ़ की नज़्में मोहब्बत के बंधे-बँधाए आयामों को तोड़ती हुई दिखती हैं, जहाँ यह ‘दमे की शिकार मोहब्बत’ एक हाथ अपने महबूब की आँखों पर रखती है तो दूसरा अपने उन कानों पर जिन्हें ‘क़ायदों’ का शोर बहरा करने पर तुला है। बर्क़ बदन है तो साँस मिट्टी और हौसले इतने कि दीवारों के ढह जाने का इंतज़ार, बिना किसी ग़म के। यक़ीन है कि कुछ ही नज़्में पढ़ने के बाद आप सभी नज़्में पढ़े बिना नहीं रह पाएंगे। – पोषम पा।

(1)

अलिफ़

अकेला आदमी
मोहब्बत की नज़्में
लिख सकता है

दो लोग
मोहब्बत की नज़्में
जी सकते हैं

(2)

बेनाम लड़की

वो चेहरा उदासी, ख़ुशी, ख़्वाब और कश्मकश का इक ऐसा समुन्दर कि जिसमें गुलाबी तहों से निकलते हुए आहनी दायरे खींचते थे मेरे जिस्म को अपनी जानिब, मैं ये सोचता था कि उसकी निगाहों से कहदूँ उठो और उठ कर मेरे अंदरून ए बदन तक चली आओ, चलती चली आओ लोगों की सोचों के फ़रसूदा जाले हटा कर मैं तुम पर लिखूंगा अबद तक नए लफ़्ज़ जो मैं तुम्हारी ही बाहों की मिट्टी से, बग़लों की बू से, कमर की तराश और दिल की तरावट से, माथे के परचम से सीने के दो आबनूसी उजालों से और ग़ार ए बदन को छुपाती हुई कासनी पत्तियों से, रानों की हिद्दत से, एड़ी के बल और तलवों की शिकनों से पैदा करूँगा, चलो तुम मेरे साथ चल कर तो देखो, मैं ईरान की बुझ चुकी आग का आख़री देवता और अँधेरे का पहला पयम्बर, कहानी का बे-रूह किरदार, साँसों का झरना, तमद्दुन के कोड़ों से छीला गया ख़्वाब तुमको लिखूंगा, उदासी की शामों में तुम को मैं मुट्ठी में लेकर हिरन की तरह चौकड़ी जब लगाऊंगा देखेगी दुनिया मेरी आह के ज़र्दी-माइल धुंए को, मैं तुम पर उतारूंगा रातों का क़ुरआन और वेद दिन के, मैं गीतों से, नग़मों से, शेरों से, लफ़्ज़ों से, हर्फ़ों से आगे तुम्हारे बदन के लिए इक नया ईस्तआरा बनाऊंगा इक रोज़, बेनाम लड़की, ख़ुदा के लिये या मेरे हैरती लम्स के नाचते रोंगटों की क़सम कुछ कहो, तुम कहाँ खो गयी हो

(3)

पहली नज़्म

ये पहली नज़्म
तेरे हर्फ़ जैसे मौतबर होंठों की ख़ातिर है
तेरी बे-रब्त साँसों के लिए है
तेरी आँखों की ख़ातिर है
ये पहली नज़्म
उन जज़्बों की ख़ातिर है
जिन्हें छींटा पड़ी मिट्टी से मैं ताबीर करता हूँ
जिन्हें मैं रात में इक इक नफ़स
ज़ंजीर करता हूँ
जिन्हें मैं अपनी शिद्दत से
सदा ए इंतिहा ए हुस्न ए आलम-गीर करता हूँ
ये पहली नज़्म
मेरे ख़्वाब की ख़ातिर है
जिस तक तेरे क़दमों की रसाई होने वाली है
ये पहली नज़्म
उस शब के लिए है
जो मेरी ज़िन्दगी भर की कमाई होने वाली है

(4)

रात
उसकी नज़्में सुनते गुज़री
जैसे सियाह आइनों पर नीली रौशनियों
का रक़्स हो
जैसे सुर्ख़ पानियों में
सब्ज़ परिंदों का अक्स हो
उसके लबों से लफ़्ज़ यूँ झड़ रहे थे
जैसे झरनों से सफ़ेदी
दिलों से दर्द
और बहुत जागी हुई आँखों से
ख़ुमार टपकता है..

(5)

बर्क़ एक बदन का नाम हो सकता है
सावन दो आँखों का मकीन बन सकता है
अबरक़ों की तरह हथेलियों से शरारे फूट सकते हैं
विंड-चाइम एक हंसी में तैर सकती है
थाप को होंठों की जुम्बिश से भी पैदा किया जा सकता है
सरगम, सुरों की माला उतार कर लफ़्ज़ का ज़ुन्नार पहन सकती है
धूप सायबान बन सकती है
दुख मेहरबान लग सकता है
अक़्ल हैरान हो सकती है
और मोहब्बत
सन्नाटे के पसीने से तर-बतर
सुनहरे सेहराओं के सीने पर
ज़ख़्म के बजाये फूल भी खिला सकती है

(6)

तुम्हारी
नाराज़गी
झपकी की तरह
पैदा होती है
सर्द रात में लम्बी और
सुनसान सड़क पर
सवारी दौड़ाते हुए
क़स्साब की दुकान में
लकड़ी के गोल ठीहे पर
उँगलियों के पास से
गुज़रते हुए
धार-दार छुरे की तरह
आंधी में किसी
शाख़ से लिपटे हुए
पत्ते की मानिंद
और
उस वक़्त की मिसाल
जो हसरतों के बादलों
में लिपटी हुई चांदनी रात
बन कर नाज़िल हो

(7)

मोहब्बत में कभी
ऐसा भी होता है
कि आस पास लेटे
दो इंतिहाई नंगे जिस्म
ख़्वाब के
ज़ख़्म दिख जाने के डर से
एक दूसरे की आंखों पर
हाथ रख देते हैं

(8)

बातों को
किसी रिश्ते की बुनियाद
मानने वाली लड़की
कल रात
बहुत ख़ामोश थी

(9)

मोहब्बत में ग़लत फ़हमियां
पीठ पर
उजालों का बोझ उठाये
सीने पर
अंधेरों का ज़ख़्म सजाये
दूर से दिख जाती हैं
ख़लाओं में
तैरती हुई इन ग़लत फ़हमियों
का दूसरा नाम उम्मीद है
और इस उम्मीद का पैरहन
पीछे से जल रहा है
आगे से
बरस रहा है

(10)

ख़ूबसूरती में उसकी
मिसाल ढूंढना
मुम्किन नहीं
क्योंकि वो
किताबों की सीली पर
सजी महक है
समुंदरी लहरातों से
तराशा हुआ
सुर्मई पत्थर है
सर्द रातों में
स्लाइडिंग से नज़र आती
हलकी नीली चमक है
चटख़ारे के ठीक दरमियान
पैदा होने वाला रस है
फिर भी उस काफ़िर को
मेरे इस यक़ीन पर
शक है
कि वो क़ुदरत की
सब से हसीन तख़लीक़ है

(11)

मैं
तुम्हारे सुर्मई सीने पर
अपनी उंग्लियों से
लम्स की वो धारियां बनाना चाहता हूं
जिन्हें वक़्त
सांसों के धुएं से इतना सुर्ख़ करदे
कि तुम्हारी गरदन से रानों तक
फैले हुए तारों में
मेरी ख़्वाहिश के
गर्म सय्याल के अलावा
और कुछ न बहे
मेरी करवटों में
चटख़ती हुई दोपह्रें
तुम्हारे जिस्म की उन
सर्द सिस्कियों तक
पहुंचने पर आमादा हैं
जिनका राज़दार हो जाना
कानों की मेराज है
वो दिन दूर नहीं
जब तसव्वुर का दम
भरने वाली
दमे की शिकार मोहब्बत
तुम्हारे जिस्म के सांवले
अर्श तले लेटी
ताज़ा सांसें ले रही होगी

(12)

जब कहा जा चुका है
कि दरवाज़ा बंद है
जब बताया गया है
कि सामने दीवार है
जब लिखा हुआ है
कि आगे रास्ता नहीं है
फिर यहां रुकने का मतलब
पाली हुई मायूसी
और बोए गए
अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं
तुम कीकरों के बीच
मौजूद पानी की
गूंजती हुई लह्र नहीं हो
जिसके नसीब में
एक लम्बा और सुनहरा रास्ता हो
बग़ैर रुकावट वाला

(13)

वो एक किताब है
जिसे
हर्फ़ ब हर्फ़
पढ़ने की मेरी ख़्वाहिश
आईनों के दिल
हवा के रक़्स
और
रात के धुंधले सन्नाटे में
पहले से मौजूद थी
मगर हम सब
सदियों से
उसका चहरा पढ़े जा रहे हैं
जो ताबनाकी का
शह्र है
सौंधे मौसमों का बाज़ार है
नमकीन फूलों से लदी हुई
शाख़ है

(14)

जब एक शायर
तुम से मोहब्बत करे
तो लाज़मी है
कि तुम क़ाफ़ियों की पाज़ेब पहन कर
ज़ह्न की बे-आराम छतों पर
रक़्स करो
हर्फ़ और लफ़्ज़ के बीच
मौजूद ख़ला में
टांगी गई वक़्त की कुंजी
अपनी रानों में छुपा लो
और शायर की ज़बान
खाल की
गर्म परतों पर लहरें उगाती हुई
तुम्हारे जिस्म के
उन हल्के सियाह होंठों तक पहुंच जाए
जो बोलने के लिए नहीं
धड़कने के लिए पैदा हुए हैं

(15)

इस रिश्ते पर
सर्दियों का पहला मौसम
उतर चुका है
जो हमें
बदन की गर्मियों तक
भी ले जा सकता है
और
आंखों की बरसातों तक भी

(16)

आज उस रौशनी का मौसम है
कांच जैसी ख़याल गालियों में
कभी जिसकी तवील राहों पर
शाम उतरनी नहीं उदासी की
तर है सब जिस्म इस उजाले में
सब्ज़ हैं खेतियां निगाहों की
नीलगूं ख़्वाहिशों का पानी है
फ़ज्र के वक़्त की कहानी है


मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 2

मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 3

मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 4


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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