(1)

ये बर्फ़ की तरह ठंडा हाथ
अपनी तासीर में
बर्फ़ की सफ़ेद परत के नीचे रेंगते
आतिशीं अज़दहे की तरह गर्म है
इस हाथ को मेरे सीने पर
रख कर देखो
एक तिलिस्मी ग़ार का दर
खुलता है या है नहीं
तुम इन ठंडी उँगलियों को मेरी
बे आराम सेहराई आँखें छू लेने दो
ताकि उनमें उबलती हुई
बे-चैन सियाह चीलों की नारंगी उदासी
रात का नंगा हुस्न देख सके
इन हाथों को मेरे हाथ में
उतने बरसों तक थमा दो
जब तक मेरे हाथ
बिलकुल सर्द न हो जाएँ
इन सीम-रंग पैरहन ओढ़ी हुई
यख़-बस्ता हथेलियों की क़सम
ग़ौर से देखो
वहां लकीरें नहीं
मेरी तक़दीर के बहके हुए क़दम समतें उभार रहे हैं

(2)

मैं और तुम मिलेंगे
मौसमों के आख़री छोर पर
बादबान की फड़फड़ाहट में
बारिशों से बचाते छज्जों के नीचे
घांस से सजाये गए टेरेस के ऊपर
रेस्तुरानों की झिलमिलाती रौशनियों के आगे
गाड़ियों की पिछली सीट पर
नद्दियों के हिनहिनाते जोबन के सामने
ख़्वाबगाहों की सुरमगीं अंगड़ाइयों में
सोफ़े की धंसती और हंसती हुई ज़मीन पे
हम और तुम
बारूदों के मौसम में
खांसते हुए लोगों के गले पर
तैरती हुई राहत की तरह उगेंगे
हम और तुम
नफ़रत की खंखार से डरे हुए
शहरों के दरमियान
ख़्वाहिश की बेबाक रेल के मानिंद
हिरनों की सी क़लांचें भरेंगे
हमदम
तुम शाम को जब भी चाय पियोगी
उससे उठते हुए धुवें की सफ़ेद लहरों को
मैं अपने होंठों में भर कर
उदास जंगलों और वीरान जज़ीरों या फिर
बंजर ज़मीनों पर
इस्म ए आज़म की तरह फूँक दूंगा
और सारी दुनिया
सर सब्ज़ हो जायेगी
तुम्हारे बदन की तरह

(3)

हम और तुम
एक ना-मुख़्ततिम हिज्र की भट्टी से
हाँपते-कांपते निकले हैं
और ठहर गए हैं एक दूसरे के जिस्म
की दीवार से टेक लगाकर
ये दीवार रेत की हो या पानी की
धूप की हो या भंवर की
राहत की हो या रंज की
थके मांदे, ख़ामोश दिल को
इस बोलती हुई दीवार ए उम्मीद के
साये तले बैठ कर
सुकून की सांसें मयस्सर हैं
इसलिए
हम तो यहाँ से नहीं उठ सकेंगे
दीवारों के बैठ जाने तक

(4)

उन आंखों की बात न करना वर्ना नींद नहीं आएगी

तारों के हमराह जगेंगे पीतल के तालाब
होंठ की धरती से फूटेंगे शब्दों के बर्फ़ाब
जलता रहेगा रात गए तक दिल का ये तन्नूर
शह्र की रात में ख़्वाब लिखेगा सन्नाटे का नूर
आसमान की मांग में नीले पानी का सिंदूर
पंखों के ब्लेडों से रक़्स उगाती इक आवाज़
डेस्क-टॉप के कांधे पर तन्हाई नीम दराज़
दीवारों से नाक रगड़ते गीतों के याजूज
एक उदास ख़ुशी के मैदां में सीने की फ़ौज
उसकी आंखें दनिया भर के ज़ख़्मों पर मरहम
सबसे अच्छा दुनिया में उन आंखों का में मौसम
दुनिया वालो! उन आंखों में डूब गए हैं हम
हम को कैसा ग़म

(5)

तुम्हारी नाफ़
ख़्वाब की कत्थई तख़्ती है
जिस पर मैं अपनी ज़बान के गुलाबी लम्स
नक़्श कर रहा हूँ
इन गुलाबी रोंगटों पर उगी हुई
बे रंग पानी की झिल्लियां
तुम्हारे कसमसाते
और सिसकी जगाते जिस्म की
एक चुटकी में उतर आयी हैं
जिन में पहले से मौजूद हैं
पैदाइश से अब तक  की तमाम हसरतें
नींद में ली गयी करवटें
और
किसी को बाहों के दायरे में कस न सकने पर
पैदा होने वाली अंगड़ाइयां

(6)

सच कहो
क्या तुम नहीं चाहतीं
कि हम एक नया मौसम पैदा करें
हम सब कुछ
वस्ल और वक़्त में बंधे बंधे
एक कम्बल, दो नंगे जिस्म और चार नश्शा-आमेज़ आँखों
की मदद से
तैयार कर सकते हैं
क़ुदरत की मश्शाक़ हथेलियों से तराशे गए
तुम्हारे निहायत गोल पिस्तानों के दरमियान
मेरी साँसों की बरसात हो
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के सियाह शहर में
मेरे कन्धों की चमकती हुई हड्डियां पिघलने लगें
और मेरी ज़बान पर उगने वाली हिद्दत का ज़ायक़ा
तुम्हारे बदन की पोर पोर में
गीलाहट भर दे
हमारी रानें, एक दुसरे के आबनूसी तनों में
कीड़ों की तरह दाख़िल हो जाएँ
जिस्म छिल जाएँ और आँखें अपने बंद दायरों में सय्याल बन कर
किनारों से बह निकलें
और फिर कुछ देर बाद तुम्हारा सर मेरे सीने पर हो
और मेरी उंगलियां तुम्हारे बालों में

(7)

वो दोपहर कौन सी होगी
जब तुम बिस्तर पर
औंधी लेटी हो
तुम्हारी पीठ के चमकते हुए
अतलसी समुन्दर में
दाएं और बाएं
दो जज़ीरे उभर आये हों
और मैं ख़्वाबगाह के इस इन्तेहाई अमीर वक़्त से
वो लम्हे उधार ले सकूँ
जो सतह पर चमकती हुई सर्द धूप में
मुझे अपने होंठों से शरारे पैदा करने का हुनर सिखाएं
तुम्हारी पुश्त पर उगी हुई सडोल और बे-अंत ख़ामोशी
मेरे गालों को हलके हलके थपथपाये
और उसी सुरमई मिट्टी में
मेरी तन्हाई का आख़री सूरज
तुम्हें पहनते हुए
तुम में ग़ुरूब हो जाए

(8)

मैं धूल-नगर का बाशिंदा, बंजर के देस का बासी हूँ
पानी की तलाश में सरगरदां इक भूकी तंग उदासी हूँ
शहराहों की इस दुनिया में पगडंडी एक ज़रा सी हूँ
आवाज़ के जंगल में बैठा ख़ामोश कोई सन्यासी हूँ
जिस ताल से दिल का जल निकले वो ताल कभी के सूख गए
जो पत्थर मारे पेड़ों पर वो सारे फलों से चूक गए
हम जैसे तो इस दुनिया से सीने में उठाते हूक गए
कुछ घोरी हम पर हंसने लगे, कुछ मंतर वंतर फूँक गए
ऐसे में तुम्हारी बाहों ने नगरी का अँधेरा दूर किया
पानी को दिए कल कल घुंघरू और जंगल को मख़मूर किया
बिजली को तजल्ली में बदला, हर परबत कोह ए तूर किया
पपिहों की उड़ानें तेज़ करीं, साँपों को नशे में चूर किया
वीरान नगर को छिन भर में बस्ती की शक्ल अता कर दी
धूपों की हाँपती आँखों पर ज़ुल्फ़ों की सर्द घटा कर दी
बरगद को और ज़रा सी उम्र, आकाश से हाथ छुपा कर दी
क़ालीन बिछा कर काई का मौसम के हक़ में दुआ कर दी
ऐ परी-नुमा, मौज़ू ए ग़ज़ल, लफ़्ज़ों का उजाला तुमसे है
ये दिन की छप-छप है तुमसे, ये रात का जाला तुमसे है
मायूसी के हर चेहरे पर उम्मीद का हाला तुमसे है
ये ख़्वाब के सजदे हैं तुमसे, ख़्वाहिश का शिवाला तुमसे है
तुम इस मौसम में चकोरों के त्यौहार से मत घबरा जाना
ये सब्ज़ ख़ुशी क़ायम रखना, तकरार से मत घबरा जाना
इस रक़्स से मत उकता जाना, मल्हार से मत घबरा जाना
मेरे इश्क़ से रूठ नहीं जाना, मेरे प्यार से मत घबरा जाना

(9)

जब हम मिलते हैं
तो वक़्त हमें देखता रहता है
वो हमारे दरमियान बिछी महीन सुरमई शाम को
अपनी उँगलियों पर तारों की तरह
लपेटता जाता है
मगर उसे क्या ख़बर
कि तुम्हें देखते वक़्त
रुक जाती है मेरी नज़र
एक ऐसे मेहवर पर
जिससे बनने वाली याद की गर्दिश
तुम्हारे चहरे पर दिखने वाले सुकून
माथे पर उगने वाले अंदेशों
बाज़ुओं से फूटने वाली अंगड़ाइयों
फैली हुई पिंडलियों
और चमकती हुई हथेलियों को
मेरे बदन के गिर्द लपेट रही होती है
तुम्हारे मासूम चहरे पर बिखरी हुई लट
मेरी हैरत का तराशा हुआ सबसे हसीन नक़्श है
वक़्त हमारे दरमियान
मौजूद शाम को उंगली पर लपेट सकता है
उस शाम को नहीं
जो हमारे दरमियान का सारा फ़ासला
आहिस्ता-आहिस्ता ख़त्म कर रही है

(10)

ऐ निगाह ए शफ़क़ आसार तुझे क्या मालूम
तुझ से क़ायम है निज़ाम ए ग़म ए दुनिया सारा
इन्ही आँखों में है मौजूद सितारों की रमक़
इस ख़ला में ही भटकता है दिल ए आवारा
सुब्ह की तुझ में झलक, रात के जुगनू तुझ में
फ़ितना ए गर्दिश ए अय्याम के गेसू तुझ में
कहीं पोशीदा है बंगाल का जादू तुझ में
कई आवारा हैं दिल-दश्त के आहू तुझ में
तुझ में दरिया की बला-ख़ेज़ियाँ, झीलों का सुकून
आबशारों का सा बद-मस्त हरीफ़ाना जूनून
तेरी अपनी ही अदालत तेरा अपना क़ानून
हुस्न ए क़ुदरत तेरी जुम्बिश का ज़रा सा मज़मून
जिसपे रौशन है तेरी राह, वही मंज़िल है
मेहरबां जिसपे ज़रा तू हो वही कामिल है
कौन मंज़र तेरी हमराहियों के क़ाबिल है
कौन से लम्हा ए नादीदा को तू हासिल है
ऐ निगाह ए शफ़क़ आसार मुझे क्या मालूम

(11)

मैं साथ हूँ
जब तक लफ़्ज़ साथ न छोड़ जाएं
आँखें चिराग़ न गुल कर दें
बदन ज़र्द न हो जाए
खाल सूख न जाए
होंठ अकड़ न जाएं
झुर्रियां सख़्त न हो जाएं
और जब तक मुझे दो क़दम चलने के लिए
चार आदमियों की ज़रुरत न पड़े
मैं साथ हूँ तुम्हारे
चाहे तुम साथ रहो न रहो

(12)

आपके पास क्या होना चाहिए पहचान के लिए
ज़ात
मज़हब
रंग
या
मुल्क
आपके पास क्या होना चाहिए अच्छी ज़िन्दगी के लिए
मकान
नौकरी
गाड़ी
या
हथेली पर चमकती हुई स्क्रीन
आपके पास क्या होना चाहिए तन्हाई के लिए
शराब
हिज्र
उम्मीद
या
उदासी
मेरे पास पहचान, अच्छी ज़िन्दगी और तन्हाई के लिए
सिर्फ़
मोहब्बत की नज़्में हैं


मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 1

मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 3

मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 4


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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