(1)

तुम मुझसे नाराज़ न होना

मैंने अपने दिल पन्नों पर हर्फ़ लिखा है ख़्वाबों वाला
इस जंगल से गुज़र रहा है इक आसेब सराबों वाला
नींद नगर मीनारों वाले, याद महल मेहराबों वाला
सब खो जाता है जब दिल पर बरसे ग़म का अब्र सलोना
तुम मुझसे नाराज़ न होना
शाम किनारे बैठा हूँ और दिल-दरिया फुंकार रहा है
पथरीली दीवारों पर ये कब से मौजें मार रहा है
नाम तुम्हारा ज़ोर ज़ोर से चारों ओर पुकार रहा है
सिर्फ़ तुम्हारे नक़्श को कैसे ढून्ढ रहा है कोना कोना
तुम मुझसे नाराज़ न होना
इक रस्सी जो छत के ऊपर मुंह लटकाये झूल रही है
एक किताब कबूतर जैसी ऊँघ रही है फूल रही है
ये ख़ामोशी जैसे मेरे जीवन का मामूल रही है
रास नहीं आता सत्रों को ज़िक्र तुम्हारा ऐसे खोना
तुम मुझसे नाराज़ न होना
पूनम और अमावस में क्या फ़र्क़ अगर तुम साथ नहीं हो
वो मौसम बे-रंग रहे तुम जिस मौसम के हाथ नहीं हो
मिटने वाला नक़्श नहीं तुम भूलने वाली बात नहीं हो
मुमकिन हो तो सारा जीवन तुम मेरे ही साथ रहो ना
तुम मुझसे नाराज़ न होना
इस चितवन से उठती किरनें दिल-दुनिया को भस्म करेंगी
शह्र और जंगल में फ़ित्नों की जारी कोई रस्म करेंगी
इक शायर किरदार की शायद आज कहानी ख़त्म करेंगी
बात सुनो, बैठो, मुस्काओ, हाथ पे हाथ रखो, हंस दो ना
तुम मुझसे नाराज़ न होना

(2)

उन याक़ूत जैसे होंठों
की सलवटों को
ग़ौर से देखो
अतलसी धज्जियों से जोड़े गए
उसके ख़्वाबों को छू कर महसूस करो
कमख़्वाब जैसी गहरी नींदों को
ओढ़ कर देखो
रेशम जैसे उसके मुलायम गाल को
हथेली की भूरी लकीरों से मस करो
तुम देखोगे
तुम्हारा एक क़दम होगा
माहताब पर और दूसरा मिर्रीख़ पर
सर बादलों की सफ़ेद रुई से उलझा हुआ
और हाथ ज़मीन की आख़री दलदली परत में धंसे हुए
और बाक़ी बदन ख़ला में
जैसे तुम अभी पैदा हो रहे हो
उन याक़ूत जैसे होंठों की सलवटों को देखो तो सही

(3)

तुम जब किसी बात पर
शुक्रिया कहती हो तो दिल में खिले
छूई-मूई के फूल
अपनी हथेलियों को
ज़ख़्मों की सब्ज़ काई की तरह बंद कर लेते हैं
इतना तकल्लुफ़, ऐसी तहज़ीब
इश्क़ के बे-किनार दरिया में तैरते हुए
सफ़ेद और नीले मंज़र पर
किसी झाग की तरह मालूम होती है
जिसका धड़ किसी सारस की गर्दन से ज़ियादा उजला
और पाऊँ मोर की खुरदुराहट से
सिवा मैला होता है

मैं अब दुनिया की तमाम औरतों में
तुम्हें देखता हूँ
सवाल पूछते वक़्त तुम्हारा आँखों को मिचमिचाना
भांप की तरह मेरे सीने में उतर कर
नाफ़ के निचले किनारे पर बोसा देता है
और दुनिया की सब औरतें मुझे
तुम्हारे आगे हेच मालूम होती हैं
वो भी जिनकी आँखों में एक झील है
माथे पर एक लाल बल्ब
बाज़ुओं में मैली और लज़्ज़त आमेज़ ख़ुशबुएँ

तुम्हारा जिस्म एक दरवाज़ा है
न कोई छत है, न कोई फ़र्श
न कोई दीवार है, न कोई रंग
यहाँ आने वाले लिबास और घड़ियाँ
बाहर उतार कर आते हैं

तुम एक ठंडी रात में
किसी अँधेरी सड़क पर
अपने होंठों की रात-रानियां
मेरे ज़ख़्मों से भरी छाती पर रख दो
और मैं तुम्हारा शुक्रिया लफ़्ज़ से नहीं
लम्स से अदा करूँ
उस पूरी रात जाग कर
उँगलियों से तुम्हारी रानों, पिस्तानों और कानों को
देहकाते हुए
बेबाकी से और तुम बरसती रहो लगातार
अपने बदन के निचले दहानों से
सफ़ेद क़तरों की सूरत

तुम्हारे और मेरे दरमियान ये रात
बे-तकल्लुफ़, नंगी और घनी होगी
जब हम शुक्रिया भूल कर
जिस्म के इस खुरदुरे तने पर
शिरकत का लफ़्ज़
एक दुसरे के नाख़ुनों से
हमेशा के लिए गोद देंगे

(4)

तुमने मुझे मोहब्बत सिखाई
जिसमें न कोई जलन है
न घुटन
न शिकवा है न फ़रमाइशें
जैसे नीले चमचमाते आसमान में
दो परिन्द
अपने परों की मुस्कुराती हवाएं
एक दुसरे पर निछावर करते हुए उड़ रहे हों
या जंगल के सूने आँगन में
फ़ासलों पर खड़े दो पेड़
ख़्वाब ए मोहब्बत में
किरनों से एक दूजे के जिस्म को छूते हों
तुम कहीं भी हो
किसी के भी साथ हो
तुम्हें छूने वाली तमाम उँगलियों में
मेरा ही लम्स है
तुम्हें देखने वाली तमाम आँखों में
मेरी ही रौशनी है
तुम्हें महसूस करने वाली हर कलाई में
मेरे ही रोंगटे हैं
तुम्हें याद करने वाली हर आह में
मेरी ही सांस है
क्यूंकि मैं ‘तुम’ हूँ*


*एक स्पैनिश फ़िल्म का डायलॉग

(5)

सन्नाटों की चादर से
पूछ रहा हूँ घर भर से
धरती से और अम्बर से
तकियों से और बिस्तर से
लेकिन सबके होंठों पर
इक ख़ामोशी छाई है
उस में एक बुराई है
मुझको नज़र नहीं आई है
सफ़हों के अंबार भी चुप
लकड़ी के मीनार भी चुप
कम्प्यूटर के तार भी चुप
झींगर की मिनक़ार भी चुप
सबका पित्ता पानी है
सबका बी-पी हाई है
उस में एक बुराई है
मुझको नज़र नहीं आई है
इश्क़ में ये तकनीक नहीं
फ़िक्र मेरी बारीक नहीं
मुंह पर कहना ठीक नहीं
लेकिन वो नज़दीक नहीं
अब तो कोई बता भी दो
क्या शायर सौदाई है
उस में एक बुराई है
मुझको नज़र नहीं आई है
उसकी कमर गिर्दाब सही
दिल उसमें ग़र्क़ाब सही
वो कोई सुर्ख़ाब सही
हर मौसम का ख़्वाब सही
लेकिन उसने रात मुझे
ख़ुद ये बात बताई है
उस में एक बुराई है
मुझको नज़र नहीं आई है
दिल से गुज़र के देख लिया
जां में उतर के देख लिया
सब में ठहर के देख लिया
गूगल करके देख लिया
वो कम्बख़्त भी मेरी तरह
उसका ही शैदाई है
उस में एक बुराई है
मुझको नज़र नहीं आई है
ऐ दीवारो! बोलो भी
ज़ह्न के पर्दे खोलो भी
बात को मेरी तोलो भी
वो इक चीज़ टटोलो भी
इतने दिनों में जो मुझको
कभी नहीं मिल पाई है
उस में एक बुराई है
मुझको नज़र नहीं आई है
उस चेहरे को ध्यान में लाओ
ज़ुल्फ़ों को मैदान में लाओ
दिल को रौशनदान में लाओ
आँखों को ऐवान में लाओ
क्या कहते हो उसपर तो
सारी ख़त्म ख़ुदाई है
उस में एक बुराई है
मुझको नज़र नहीं आई है
कोई आदत कोई बात
कोई ख़्वाब, कोई जज़्बात
कोई वक़्त, कोई हालात
कोई दिन या कोई रात
ढूंढने में इतनी सी चीज़
सारी रात खपाई है
उस में एक बुराई है
मुझको नज़र नहीं आई है

(6)

तुम्हारे नाम एक ख़त

मैं दो सूखी हुई चरचराती ज़मीनों के दरमियान से गुज़रने वाली
एक सड़क जैसा आदमी हूँ
जिस पर कोई नहीं रुकता, तुम्हारे सिवा
बरसात में भीगे हुए एक धुंधले क़ब्र के कतबे जैसा
जिसे कोई नहीं देखता, तुम्हारे सिवा
हंसलियों के दरमियान मौजूद मेरे जिस्म का नन्हा सा गोल तालाब
तुम्हारी उंगलियों के मस हो जाने के हसरत-ज़दा पानी से भरा हुआ है
मेरे ख़्वाब उन ग़ारों की तरह नहीं
जिन में नबियों ने पनाह ली हो
उन पेड़ों की तरह नहीं
जिनके साये में ज़िन्दगी का ज्ञान हासिल करने वाले
गौतम बैठे हों
मैं बग़दाद और दिल्ली की तारीख़ी सड़कों पर अचानक हो जाने वाले
गर्द-आलूद हमलों की तरह जागता हूँ
लाइब्रेरियों की तरह मेरी बाहें तुम पर लिखे हुए लफ़्ज़ों के लिए खुली हैं
मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ इंतिसाबात हैं
जिनको तुमने ऐन जिन्सी अमल में कराहती हुई मुठ्ठियों में दबा रख्खा है
तुम मक्का में दौड़ती हुई हाजरा की बेक़रारी जैसी हो
जन्नत और दोज़ख़ का फ़र्क़ मिटा देने वाली राबिया की तरह पुर-ख़ुलूस
जंग के मैदान में ज़ख़्मी सिपाहियों को पानी पिलाने वाली फ़ातिमा की तरह मासूम
और फ़रसूदा निज़ाम ए ज़िन्दगी के रास्ते में डट कर खड़ी रहने वाली मलाला की मानिंद बे-ख़ौफ़
तुम उदासी की तरह सांवली और शायरी की तरह हसीन हो
मौसीक़ी की तरह बे-पनाह और तारीकी की तरह घनी हो
रात की तरह बे-अंत और रौशनी की तरह सच्ची हो
तुम, जो मेरे बदन के इक निस्फ़-दायरा पत्थर से
टेक लगाए हुए, गहरी नींद में डूब चुकी हो

(7)

हम ने दो बज कर बारा पर नज़्म लिखी
एक हसीं इक मह-पारा पर नज़्म लिखी
जिसकी पोरें सूरज, जिसका माथा चाँद
हमने उस रौशन-आरा पर नज़्म लिखी
जिसकी गर्दन सांवले रेगिस्तानों सी
हम ने उस पीतल-पारा पर नज़्म लिखी
कानों की सुर्ख़ी से लफ़्ज़ तराशे और
जलती लौ, बहती धारा पर नज़्म लिखी
जिसके हाथ मुलायम और बर्फ़ीले हैं
ऐसी इक आतिश-पारा पर नज़्म लिखी
जिसकी कमर के लोच पे दुनिया क़ायम है
ऐसी ही इक दिलदारा पर नज़्म लिखी
जिसका सीना आग उगलती चट्टानें
उसकी निगाह-ए-आवारा पर नज़्म लिखी
अपने हौसला ए नाकाम पे रोये और
अपनी उमीद ए नाकारा पर नज़्म लिखी
वस्ल की मंज़िल ढूंढते ढूंढते फिर हमने
हिज्र की राह ए दोबारा पर नज़्म लिखी
हमने उस गुल और गुलख़िन पर शेर कहे
हम ने इस ख़ाक-ओ-ख़ारा पर नज़्म लिखी

(8)

तुझसे शर्मिंदा हैं ऐ जान ए बहार
बुर्रश ए लफ़्ज़ से हम तेरा बदन नक़्श नहीं कर पाए
हर्फ़ के बाज़ूओं को थाम के भी
शेर की कांपती बैसाखियाँ लेकर भी हम
ठीक से रक़्स नहीं कर पाय
तेरी आँखों में कई सांवरे बादल उतरे
तेरे होंठों पे लहू रंग खराशें उभरीं
ज़िन्दगी जैसी लहू रंग खराशें उभरीं
और ये ताइर ए दिल
तेरे पिस्तानों के गुम्बद से तेरी नाफ़ तलक
रोज़ ए रौशन से गया है शब ए शफ़्फ़ाफ़ तलक
तेरे क़ुरआन ए बदन पर जानां
कितने एराब लगाने हैं अभी
ताइर ए दिल को बहुत क़र्ज़ चुकाने हैं अभी
सिर्फ़ दस-बारा मोहब्बत की हमारी नज़्में
ऐ खुदावंद ए जमाल
तुझसे शर्मिंदा हैं सारी नज़्में
ये तुझे नक़्श नहीं कर पाईं

(9)

किसी से इश्क़ करो तो

इश्क़ करो तो उसकी हर इक बात पे राज़ी रहना सीखो
इश्क़ के पैदा-करदा सब हालात पे राज़ी रहना सीखो
चाहे तुमसे बात करे वो, चाहे तुम से दूर रहे
चाहे और किसी की चाहत में हर दम मख़मूर रहे
इश्क़ गुलाब बने सीने का या कोई नासूर रहे
वो कैसा आशिक़ जिसको ये सौदा ना-मंज़ूर रहे
तुम बेज़ार अगर हो जाते हो उसकी उकताहट से
मेरी मानो! यार पलट कर आ जाओ इस चौखट से
उस गुलशन को तुम तश्बीह न दो अपने दिल-मरघट से
सारे मौसम वज्द में आ जाते हैं जिसकी आहट से
या तो हवस के ख़ेमे लगाओ, या तो वफ़ा का नाम न लो
अपने सर बस एक किसी की चाहत का इलज़ाम न लो
दिल से इश्क़ करो दीवानो, चालाकी से काम न लो
या तो शराब की ख़्वाहिश छोड़ो, या हाथों में जाम न लो
राह में प्यार की धूप उगे या वहशत की मंझधार मिले
रंगों का त्योहार खिले या लोहे की दीवार मिले
ख़ुश रहना सीखो मेरी जां! चाहे दर्द हज़ार मिले
दिल में भी ये बात न लाओ, हम उससे बेकार मिले
लाखों जवाबों के बदले में दिल का सवाल ही काफ़ी है
रंग ए तरब क्यों ढूंढ रहे हो रंग ए मलाल ही काफ़ी है
शह्र ए उरूज की ख़्वाहिश कैसी, शह्र ए ज़वाल ही काफ़ी है
उससे मिलना ज़रूरी नहीं है, उसका ख़याल ही काफ़ी है

(10)

मुझे छुओ
अपनी शिकनों
सिलवटों
धारियों
और पानियों से
चाहे वो बदन में
कहीं भी उगें
या कहीं से भी छलकें
मैं इन्हें मुट्ठियों में क़ैद कर सकता हूँ
अगर तुम इजाज़त दो


मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 1

मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 2

मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 4


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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