(1)

एक शाम सिर्फ़ अँधेरे से सजाई जाये
हवाएं दबे पाऊँ आकर
स्लाइडिंग की दराज़ों में
बैठ जाएँ
तुम्हारी पिंडिलयों पर
मेरे पैर का अंगूठा लिख रहा हो
रात का सियाह गुदाज़ लफ़्ज़
तुम्हारी दाईं उँगलियों के नाख़ुन मेरे कंधे पर
गड़ो रहे हों एक अन-कहे हर्फ़ की लज़्ज़त
होंठ तुम्हारे
दायरे की शक्ल में ढल कर
बन जाएँ फड़कती हुई आँख
या फिर कपकपाती हुई शम्मा की लौ
और मैं तुम्हारी गर्दन की सांवली
तितलियों का रंग चखूं
तब तक, जब तक ये रंग मेरे तलवों तक भर कर
छलकने न लगें
और कमरे में अंगड़ाई लेकर जाग उठे
दुनिया की सबसे रंगीन सहर

(2)

तुम्हारे पास जिस वक़्त मैं बैठा था
तुम्हारे जिस्म से उठने वाली महक
मेरी शिरयानों में रस घोल रही थी

दिल कह रहा था
हम एक कभी न मिलने वाली मंज़िल तक
पहुंचने के लिए यूंही हमेशा साथ चलते रहें
और हर गुज़रते पल के साथ
और क़रीब आ जाएं

में तुम्हारे सर्द हाथ उठा कर
अपने चहरे पर रख लूं
और बोसों की बरसात से
ऐसी हरारत पहुंचाऊं
कि मेरी गीली गर्म सांसें
तुम्हारी कलाइयों से होती हुई
रीढ़ की हड्डी तक जा पहुंचें

तुम बेचारगी में ख़ुद को
मेरे सुपुर्द करदो
और मैं तुम्हारे कासनी कंधे से लिपटा हुआ लिबास
आहिस्तगी से हटा कर
वहां से तुम्हारी गरदन तक
पानियों के जुगनू उगाता चला जाऊं
ऐसे में मेरा बेताब नादीदा बायां हाथ
तुम्हारे सीने की दो मख़मली उठानों पर
मद्धम सूफ़ी रक़्स करना शुरू करदे
जब तुम्हारी सिस्कियां
लज़्ज़त के मलहार गा रही हों
तब मैं उन्हें सुन्ने के लिये
अपने होंठ तुम्हारे होंठों पर रख दूं
और उन्हें पिघला कर
वस्ल के ऎसे आबशारों में बहा दूं
जहां से हमारी वापसी का
कोई रास्ता ही न हो

(3)

रात तेरे माथे पर
मैंने अपने होंठों से
इक गुलाब महकाया
उसके ख़्वाब बनते ही
रौशनी के तह-ख़ाने
खुल गए निगाहों पर
जिनके सांवले पैकर
नग़मा-ज़न हैं राहों पर
एक सीम-गूं चादर
ओढ़ ली फ़िज़ाओं ने
तेरी शान में लिख्खी
हम्द उन ख़ुदाओं ने
जिनके हुस्न से दुनिया
हैरतों की दुनिया थी
नूर का तमाशा थी
ख़्वाहिशों का नक़्शा थी
ऐ मेरी परी-पैकर
मैंने तेरे माथे पर
जो गुलाब महकाया
उसने दिल की दलदल में
इक कंवल खिलाया है
मुझको ऐसे लफ़्ज़ों का
देवता बनाया है
जिनसे तेरे होंठों की
बंदगी भी मुमकिन है
और तेरी चौखट पर
ख़ुद-कुशी भी मुमकिन है

(4)

ये कोई फ़लसफ़ा नहीं
मुझे पता नहीं
मैं जो इश्क़ के ख़याल पर
हुस्न के सवाल पर
हंसा बहुत
जिसे मज़ाक़ सी लगीं वो चाहतें
जो ख़्वाब के भंवर की भेंट चढ़ गयीं
मेरी निगाहें इसलिए
रुकी रहीं किनारा ए ख़याल ए वस्ल पर फ़क़त
बस एक शब गुज़ार कर
ये आगे बढ़ गयीं
मगर ये तेरे क़ुर्ब ने मेरे दिमाग़ ओ दिल में कैसी रौशनी को दम किया
कभी न फिर बदलने के लिए मुझे बदल दिया
सिखा दिया कि एक शख़्स
राहत ए नज़र, सरा ए ख़्वाब, इन्दिमाल ए ज़ख़्म हो भी सकता है
वो रास्ता, जो अपनी बेक़रारियों में धूप और छाओं बन के
भागता रहे यहाँ वहां
कहीं पहुँच के ख़त्म हो भी सकता है

(5)

ज़ुल्फ़

उन ज़ुल्फ़ों पे क़ुर्बां काला रेशम, रेशमी ख़्वाब
उन ज़ुल्फ़ों के सारे मंज़र नादिर और नायाब
जब वो अपने हाथों से अपनी ज़ुल्फ़ें सुलझाए
चमकीले रेगिस्तानों में चांदी बहती जाए
उन पोरों पर सूरज के चारों ऐवान निसार
जिन से वो अपनी ज़ुल्फ़ों के लिख्खे सियह मल्हार
ऐसी ख़ुश्बू नूर-बदन सीनों में भी ना-पैद
उन ज़ुल्फ़ों में ब्लैक-होल की सब तन्हाई क़ैद
ऐसी सच्ची, ऐसी सुथरी क़िस्मत जैसी आग
लिखने वाले उन ज़ुल्फ़ों को लिख्खें काले नाग
पेशानी पर लट आये तो लाम अलिफ़ बेदार
उन ज़ुल्फ़ों से हो सकती है मौसीक़ी तैयार
एक नज़्म में कैसे बतलाये शायर ना-चीज़
वो ज़ुल्फ़ें कैसी नेमत हैं, वो ज़ुल्फ़ें क्या चीज़

(6)

मैंने इस साल कुछ नहीं किया है
मैंने इस साल सिर्फ़ इश्क़ किया
वो भी ऐसा कि ज़िन्दगी भर में
जो फ़क़त एक बार होता है
इक परी-रू की आइना आँखें
इक परी-ज़ाद का गुलाब बदन
ख़ुश्बुओं से सजी हुई हर सांस
फूल से भी लतीफ़ पैराहन
उसकी बीनाई रौशनी का सफ़र
हो समुन्दर में दूर तक जैसे
उसके दो हाथ, आबनूसी हाथ
ठंड में जागती सड़क जैसे
ज़ुल्फ़ जैसे सियाह बादलों में
इत्र छिड़का दिया हवाओं ने
उसका कलमा पढ़ा फ़रिश्तों ने
मान ली हार अप्सराओं ने
होंठ पर जैसे लाला-ज़ारों ने
अपने हाथों से फूल मल दिये हैं
उसने चाहा तो दस्त ए क़ुदरत ने
सैंकड़ों फ़ैसले बदल दिये हैं
हुस्न पाया है फ़ितना-सामां ने
जन्नतों का मज़ाक़ उड़ाता हुआ
हमने देखा नहीं ख़ुदा को भी
उसे भरपूर देख पाता हुआ
उसको सेहरा में सोचने वाले
सारबानों का गीत लिखते हैं
शायर अपने तमाम शेरों में
उसकी ही बात-चीत लिखते हैं

(7)

शाम

ऐ शफ़क़ रंग शाम
तूने देखा तो होगा वहां
कल उसे बात करते हुए
रौशनी के ख़ज़ाने लुटाते हुए
वो हज़ारों में सबसे अलग
पानियों की तरह शोर करती हुई उसकी आँखें जो हैं आबशारों में सबसे अलग
उसकी सर-सब्ज़ किलकारियां, दश्त ए आवाज़ के सब्ज़ा-ज़ारों में सबसे अलग
शाम तुझको है मेरी क़सम, मेरे लफ़्ज़ों की सौगन्ध खा कर बता
क्या उसे देखते देखते, तार साँसों के आपस में उलझे न थे
वो जो सब नुक़रई रंग थे, वो जब सब जादुई हर्फ़ थे
देख कर क्या उसे रश्क करते न थे
हाथ मलते न थे
ऐ शफ़क़ रंग शाम, तू बता तो सही
कल मेरे डूबते ख़्वाब का इन्हिसार, सांस लेते हुए किन सफ़ीनों पे था
हुस्न तेरा भी शायद बहुत था मगर, पर तेरे हुस्न का क़त्ल कैसे हुआ
आख़िर उसका लहू, कौन सी ऊन की आस्तीनों पे था
वो हमारा ख़ुदा
बस हमारा ख़ुदा
वो तिलिस्मात का देवता
अपने पैकर से क्या, तेरे माथे पे टीका सजाता न था
क्या हमारी तरह, जान से जा के भी
ख़ुद पे शरमा के भी
उस पे बे-इंतेहा प्यार आता न था

(8)

तुझको जाने न देंगे कहीं
ऐ गुल ए आरज़ू ए विसाल
ऐ तमन्ना ए सद दिल-नशीं
जब हवाओं के इक्कों पे होके सवार ख़्वाब के ख़ूबसूरत ख़ुदा आएंगे
जिस्म के दश्त में फूल खिल जाएंगे, याद के पैरहन रात की सर्द रेलिंग पे लहरायेंगे
जब समुन्दर नमक-ज़ार होते हुए, चाँद की लौ से शीरीं कलामी करेगा
जब गुलिस्तां का कोई सियासी नुमाइंदा सामान ए ख़ुश-इन्तेज़ामी करेगा
हम तेरे साये के साये में डूब कर
तेरी ज़ुल्फ़ों के पैराए में डूब कर
हम तेरे हाथ को हाथ में थाम कर, खुशबू ओ रंग की सारी बरसात देखेंगे
बस तेरे साथ देखेंगे
ख़्वाहिश ए ज़िन्दगी
तुझको कोई हवा, तुझको कोई नज़र
देवता हो, ख़ुदा हो कि पैग़ामबर
अब हमारी नज़र से न ओझल कभी कर सकेगा ये ईमान की बात है
तू हमारा है और हम तेरे हैं हमेशा हमेशा ये पैमान की बात है
मॉल की मग़रिबी सम्त से कुदरती मख़मली सब्ज़ क़ालीन तक
इश्क़ के ऐन से तय करेंगे सफ़र ये हमारे बदन सांस के आख़री सीन तक
दिल के अँगनाये में डूब कर
शाम की चाय में डूब कर
तेरी आँखों में आँखों का सूरज डुबोते हुए हम कहेंगे कि ऐ माह-रू
इश्क़ ही कामयाब, इश्क़ ही सुर्ख़-रू
ज़िन्दगी भर फ़क़त एक मैं, एक तू

(9)

अकेला आदमी
कुछ नहीं कर सकता
सिवाए मज़दूरी करने के
सिक्के समेटने के
गाड़ियां चलाने के
ज़िम्मेदारियाँ निभाने के
नमाज़ पढ़ने और पूजा पाठ करने के
तनहा रहने के
और किसी को याद करते करते मर जाने के
मगर दो लोग चाहें
तो बहुत कुछ कर सकते हैं
समाज को मुंह चिड़ा सकते हैं
सड़कों पर हाथ में हाथ लिए मीलों तक चल सकते हैं
एक दूसरे की बुरी आदतें बदल सकते हैं
मज़हब को त्याग सकते हैं
दौलत को ठोकर मार सकते हैं
हंस सकते हैं
महफ़िल बन सकते हैं
और हमेशा ज़िंदा रह सकते हैं
अकेले आदमी और दो लोगों के साथ के बीच सिर्फ़ मजबूरी और मुख़तारी की छोटी सी लकीर है

(10)

दो लोगों को बिछड़ने से पहले
ठीक से मिल लेना चाहिए
दरवाज़ों के पीछे
नर्म और मख़मली बिस्तरों की लम्बी गहरी साँसों के बीच
उन्हें एक दूसरे के बदन की महक को
अपनी खाल के बारीक सुराख़ों में जज़्ब कर लेना चाहिए
उन्हें गुज़ारना चाहिए एक ऐसी शाम
जो धर्म की ज़ंजीरों से बंधे हुए
बीमार कुत्तों के मुंह पर एक तमांचा हो
उन्हें पेट की नर्म ज़मीन पर उँगलियो के दो-मुंहे क़लम से
लिखना चाहिए समाज की मुर्दा ज़हनियत का नौहा
दो लोगों को
अपने होंठों, हाथों, टांगों और सीनों पर
वो कपकपाहट लपेटनी चाहिए
जिसे गुज़रते हुए वक़्त की सैंकड़ों, हज़ारों चादरें दूर न कर सकें
दो लोगों को एक दूसरे के साथ
मुकम्मल तौर पर दूसरा हो जाने से पहले
एक दफ़ा ज़रूर एक होकर देखना चाहिए


मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 1

मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 2

मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 3


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

Leave a Reply

Related Posts

नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘झेलम’ – आशीष मनचंदा

प्रेम, भरोसा, समर्पण.. ये सारे शब्द एक ऐसी गुत्थी में उलझे रहते हैं कि किसी एक की डोर खिंचे तो तनाव दूसरों में भी पैदा होता है। बिना प्रेम भरोसा नहीं, बिना भरोसे समर्पण नहीं। Read more…

नव-लेखन | New Writing

बनारस का कोई मजाकिया ब्राह्मण लगता हूँ – आदर्श भूषण

आज कुछ सत्य कहता हूँ, ईर्ष्या होती है थोड़ी बहुत, थोड़ी नहीं, बहुत। लोग मित्रों के साथ, झुंडों में या युगल, चित्रों से, मुखपत्र सजा रहें हैं.. ऐसा मेरा कोई मित्र नहीं। कुछ महिला मित्रों Read more…

नव-लेखन | New Writing

‘आजा फटाफट, चिल मारेंगे’ – प्रद्युम्न आर. चौरे

“रात सोने के लिए है।” यह एक जुमला है और यही सच भी क्योंकि मुद्दतों से फ़र्द इस जुमले की ताईद करते आए हैं। यह जुमला या यूँ कहूं कि नियम इंसान ने ही गढ़ा होगा Read more…

error:
%d bloggers like this: