एक तिराहे पर दो सेकंड रुकना हुआ, आधी नींद में था। आँख की एक झपक के बीच ही कई छोटे दृश्य दिखे।

पहले में एक आदमी अपनी पत्नी को साइकिल की पीछे वाली सीट पर बैठा कर काम पर जा रहा था, दोनो शायद एक ही जगह काम करते होंगे। पत्नी अपनी दोनो टांगो को एक तरफ किये बैठी थी, टांगें ज़मीन को लगभग छूते हुए, सीट को दोनो हाथो से पकडे हुए। काफी धूप थी। तिराहे पर शायद पत्नी के पाँव से चप्पल निकल गयी, उसने पति को बोला होगा तो पति ने साइकिल रोक दी। जहाँ से मुझे दिखा, पति मुस्कुरा रहा था। मैं होता तो शायद मुझे गुस्सा आ जाता।

दूसरे में एक बाइक और एक साइकिल आपस में भिड़ गये, साइकिल वाला बाल बाल बचा, बुरी तरह चोट लगने से। बहरहाल, बच गया।

तीसरे में एक और औरत औटो की पीछे वाली सीट में बैठी हुई थी (“में” इसलिए कहा क्योंकि वो सीट ऐसी ही होती है जिस ‘पर’ बैठा नहीं जाता, जिस ‘में’ बैठा जाता है)। काम पर जा रही होगी, बिन फ़िक्र किये कि चेहरा tan होगा या कमर।

चौथी तरफ मैं था, औटो में अधसोया बैठा हुआ, सोचते हुए, जो कितने दिनो से सोच रहा हूँ। सोचता ही जा रहा हूँ।


Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

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