उँगलियों पर तितली बैठी है कभी?
क्या उसके पंखों को तुम्हारी कोशिकाओं ने स्पर्श किया है?
उसकी कोमलता की मीमांसा की है तुमने?
या उससे पूछा कि प्रकृति के हर वर्ण में तुम इतनी सुन्दर क्यूँ हो?
नहीं!
तुमने हमेशा उसे पकड़ने में ही अपनी ऊर्जा गंवायी है
बचपन से लेकर अब तक..
जब हाथ पहुँच नहीं सका,
तो जाल से काम चला लिया
आखिर तुमने उसे गींज कर ही दम लिया
जब तक उसके पंख सौन्दर्यविहीन न हो गये..
उस समय;
तुम्हारा मस्तिष्क शून्य में था
और संवेदनाएं अम्ल हो गयी थी
बस इसीलिए
तुम स्त्री को नहीं समझ पाए
या हम सब;
शायद कभी समझ भी नहीं सकेंगे
उस दिन तक,
जब हमारा समाज
तितली पकड़ना एक अमानवीय घटना नहीं बताता,
या जब तक वो खुद डंक न मारने लगे।

चित्र श्रेय: स्वयं लेखक द्वारा