औरत और मर्द

'औरत और मर्द'  - खलील जिब्रान  (अनुवाद: बलराम अग्रवाल) एक बार मैंने एक औरत का चेहरा देखा। उसमें मुझे उसकी समस्त…

तक़सीम

'तक़सीम' - गुलजार (अनुवाद: शम्भू यादव)  जिन्दगी कभी-कभी जख्मी चीते की तरह छलाँग लगाती दौड़ती है, और जगह-जगह अपने पंजों के निशान…

प्यार

'प्यार' - कमला दास कविता: 'Love', कविता संग्रह 'Summer In Calcutta' से; अनुवाद: पुनीत कुसुम जब तक तुम मुझे नहीं…

खुल सीसामा!

'खुल सीसामा!' - भुवनेश्वर  (अनुवाद: शमशेर बहादुर सिंह) खुल सीसामा! और खुल गया द्वार वह जिसकी मुहरबंद शक्ति में धन था धन!…

एक छोटी दंतकथा

लघुकथा: 'एक छोटी दंतकथा' - फ़्रेंज़ काफ़्का (अनुवाद: पुनीत कुसुम) 'आह!,' चूहे ने कहा, 'पूरी दुनिया प्रतिदिन छोटी होती जा…

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