Subhadra Kumari Chauhan

तुम

जब तक मैं मैं हूँ, तुम तुम हो,
है जीवन में जीवन,
कोई नहीं छीन सकता
तुमको मुझसे मेरे धन।

आओ मेरे हृदय-कुंज में
निर्भय करो विहार,
सदा बंद रखूँगी
मैं अपने अंतर का द्वार।

नहीं लांछना की लपटें
प्रिय तुम तक जाने पाएँगीं,
पीड़ित करने तुम्हें
वेदनाएं न वहाँ आएँगीं।

अपने उच्छ्वासों से मिश्रित
कर आँसू की बूँद,
शीतल कर दूँगी तुम प्रियतम
सोना आँखें मूँद।

जगने पर पीना छक-छककर
मेरी मदिरा की प्याली,
एक बूँद भी शेष
न रहने देना करना खाली।

नशा उतर जाए फिर भी
बाकी रह जाए खुमारी,
रह जाए लाली आँखों में
स्मृतियाँ प्यारी-प्यारी।