‘तुम्हारे बस में ये कब है’ – नसीम सय्यद

तुम
हमारी लिखने वाली उँगलियों की
शमएँ गुल करदो
हमारे लफ़्ज़
दीवारों में चुनवा दो
हमारे नाम के उपले बनाओ
अपनी दीवारों पे थोपो
अपने चूल्हों में जला दो
सब तुम्हारे बस में है
हम जानते हैं, मानते हैं
सब तुम्हारे बस में है
लेकिन
हमारी सोच पर ताला लगाते और
अपनी चाबियों के भारी गुच्छे में
ये चाबी डाल के
मुट्ठी दबा लेते
कहीं तह में समुंदर की उछाल आते
तुम्हारे बस में ये कब है??

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(यह नज़्म हैरी अटवाल और तसनीफ़ हैदर द्वारा सम्पादित किताब ‘रौशनियाँ’ से है, जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की बीस समकालीन शायरों की कविताओं/नज़्मों का संकलन है। 7 जुलाई 2018 को इस किताब का विमोचन है, जिसकी डिटेल्स यहाँ देखी जा सकती हैं!)