उलझी हुई ज़िन्दगी बेहतर है
सुलझी हुई हयात से,
ऐसा भी क्या सुलझना
कि कोई राहगीर भी पढ़ जाए
उलझनें हो और ऐसी हों कि
अपने भी सुलझा न पाएँ।
सुलझने में मज़ा ही नहीं कोई
उलझनें हो तो अलानाहक वक़्त भी कटेगा,
सिरे ढूँढते-ढूँढते
एक सिरा जो मिल भी जाएगा,
दूसरे की तलाश में कटेगी उम्र।
ज़ियारत की भी क्या ज़रूरत
कई ज़र्ब जो मिले
उन्हीं में ज़िया ढूँढें
ढूँढते ही रहें
और खो जाएँ कहीं यूँ
कि ख़ुदी का भी गुमाँ न रहे
यूँ ही कट जाए ज़िन्दगी
ख़ुद-ब-ख़ुद ज़फर हो जाये
उलझी हुई ज़िन्दगी।

अनुपमा मिश्रा
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