उल्कापिंड के गीले-गीले दीप

वह कौन से ऐसे पल होते हैं जो हमारी आँखों में भर देते हैं विश्वास के आँसू और जहाँ जबरन चिपका दिए जाते हों तालू और जीभ के बीच की सुरंग में दोपहरी के भर्राए-से कुछ अलसाये स्मृतिगीत।

वह कौन सी ऐसी रातें होती हैं जब आँख लगी हो गहरी और स्लेट की छतों पर गिरते हों उल्कापिंड के गीले-गीले दीप, तुम रो देते हो एक पराये देश में, सोचते हो कि बाहर गिरता होगा पानी।

वह कौन सी ऐसी सुबहें होती हैं जब सूरज और चाँद हों बादलों की रज़ाई में लिपटे पड़े और उनके नीचे हो फैली इंद्रधनुषी चादर और तुम्हें हो भ्रम सूर्योदय की साँझ में, तीन लोमड़ियाँ हो तुमसे बातें कर रहीं।