उम्मीद अब भी बाकी है

भारत में ऐसी जगह नहीं है, जहाँ कि हमारी जाति के लोग न रहते हों। इस देश के लगभग प्रत्येक प्रांत में हमारी जाति के लोग नजर आएंगे। सामंतवादी व्यवस्था में हमारी जाति के लोगों पर अनेक अत्याचार हुए, लोकतंत्र की बहाली होने के बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ, किसी तरह का परिवर्तन नहीं हुआ। बाबा कहता है कि हमारे पूर्वज मेहतर नहीं थे बल्कि संभ्रांत जमींदार या फिर खुशहाल खेतिहर थे। मोहम्मद गोरी से युद्ध में पराजित होने के बाद हमें जबरदस्ती धर्मातरंण के लिए बाध्य किया गया, किंतु हम राजी नहीं हुए। तब विजित शासकों ने हमें तरह-तरह से अपमानित किया, हम मल-मूत्र उठाने के लिए बाध्य किए गए और इस तरह परवर्ती काल में हम अस्पृश्य कहलाते रहे हैं। अब हमारे काम की प्रवृत्ति बिल्कुल बदल गई, बाजा बजाना, सार्वजनिक सड़कों की सफाई, शौचालय की सफाई आदि कार्य हमें करने पड़े और मांस-मदिरा का सेवन करना हमारी दिनचर्या बना दी गई। इस तरह से हम इस बिरादरी में बदल गए।

बाबा ब्राह्मण और करण लोगों पर बहुत गुस्सा होता है, बाबा जब-तब देशी दारू पीकर चिल्लाता है- “साला इइइ! पूरी पृथ्वी पर ब्राह्मणों का राज हो गया है, हमारा उद्धार करने वाला कोई नहीं। केवल कागजों पर हरिजन की बात करता है, किन्तु कोई साला हरिजन के लिए कुछ नहीं करता है। हम मेहतर थे, अब भी मेहतर ही हैं और मैला ढोने का काम कर रहे हैं। मैं कब से चिल्ला रहा हूँ कि बच्चों को पढ़ाओ ताकि जब पढ़-लिखकर आदमी बन जाएँ, तो हमारा उद्धार कर सकें। नहीं तो ये जाति इसी तरह युग-युग तक इस दमघोंटू माहौल में पड़ी रहेगी।”

लेकिन बाबा मल-मूत्र ढोने, साफ-सफाई का काम नहीं कर खदान में मजदूरी का काम करता था। खदान से थोड़ी दूरी पर हमारी बस्ती थी। वहाँ बरगद के पेड़ के चारों तरफ बने चबूतरे पर बाबा काम समाप्त करने के बाद जुआ खेलता था और बीड़ी पीता था, जब बीड़ी खत्म हो जाती, तब मुझे रामू मियाँ की दुकान पर बीड़ी लाने भेज देता था। खेल जब जम जाता और इस बीच कोई कौआ पेड़ के ऊपर से टट्टी कर देता, तब उसे गुस्से से गाली देता और जब बरगद का फल गिरता तो चलने वाली हवा को गाली देने लगता था।

बंजर पहाड़ के ऊपर बासुलेई का टूटा मंदिर है, पहाड़ को काटकर मंदिर तक पहुंचने का रास्ता बनाया गया है। मंदिर की दीवार पर चढ़कर देखने से हमारी बस्ती ऐसी लगती, जैसे कोई भूखा आदमी मंदिर की तरफ ताक रहा हो। बस्ती के लोग बाबा को खूब मानते थे। बाबा का जिस दिन खलासी से पदोन्नति हुआ, उसने बढ़िया पार्टी दिया था। सब लोग कहते थे कि मर्द हो तो नारू जैसा, साला दरियादिल है और बाबा खुश होकर कहता, “अरे ये क्या खाना है, खाना है तो मेरे मुन्ना की शादी में खाना। मुन्ना के लिए ब्राह्मणी को बहू बनाकर लाऊँगा। देखना, मैं मुन्ना को बम्बईया बना दूँगा, साला अभिताभ बच्चन को भी मात देगा। एस.पी. प्रसन्न मिश्रा का नाम तो सुना है न, बेटा अगर ठीक से पढ़ाई करेगा तो उस मिश्रा का कान काट देगा, फूटी कौड़ी भी किसी से घुस नहीं लेगा और अगर यह आई.ए.एस. हो गया तो अपने मैनेजिंग डाइरेक्टर सची पटनायक जैसा नहीं होगा। किसी को भी डाउट फाउल्ट में एक्सप्लानेशन कॉल नहीं करेगा।”

लेकिन बाबा का सपना खत्म हो गया, खदान में कम्प्यूटर के आ जाने से बाबा की नौकरी चली गई। तब बाबा ने लोगों को एकजुट किया और खुद उसका नेता बन गया। आंदोलन करेंगे, खदान बंद करेंगे, ऐसा धमकी देने लगा, लेकिन खदान के प्रबंधकों के कारण बाबा का यह आंदोलन सफल नहीं हो पाया। बाबा के साथ के लोग रिश्वत लेकर अपने-अपने धंधे में लग गए, केवल बाबा ही अकेला रह गया।

ठीक उसी समय एक और घटना ने बाबा पर गहरा आघात किया। माइनिंग कम्पनी के स्कूल से मेरा नाम काट दिया गया। मैनेजिंग डाइरेक्टर बोला- “देखेंगे, साला यह हाड़ी कैसे अपने बेटे को पढ़ाएगा और ऑफीसर बनाएगा?” एक आर्डर निकला जिसके हिसाब से केवल जो स्वीपर का काम कर रहा है उसी का बेटा पढ़ेगा, उसके अलावा किसी दूसरे हाड़ी का बेटा नहीं पढ़ पाएगा।

मैं स्कूल से बाहर हो गया। वहीं पर एक गुरूकुल आश्रम था, माँ मुझे लेकर वहाँ गई। मनुष्य को सपने देखने की मनाही नहीं है, तभी तो माँ मुझे लेकर अब भी सपने देख रही थी। बस्ती के लोग माँ को बहुत चालाक कहते थे, लेकिन माँ की चालाकी काम नहीं आई। आश्रम के आचार्य मेरा सर्टिफिकेट देखकर चिल्लाए, “यह गुरूकुले ब्राह्मणों के लिए है।” माँ को कहा, “उठो! उठो! जल्दी यहां से जाओ, सब अपवित्र कर दिया, अब तो गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करना होगा।”

आचार्य को भली-भांति मालूम था कि इसका बाबा नेता है। आचार्य ने माँ को झिड़कते हुए कहा कि “तुम्हारा मर्द तो नेता है, भला तुम्हारे बेटे के लिए स्कूल की क्या कमी है?”

गुरूकुल के आचार्य भी गाली दे रहे थे, ये सब सुनकर मुझे भी वहाँ पढ़ना अच्छा नहीं लगा। माँ भी चुप रहने वाली नहीं थी। माँ चिल्लायी, “ऐसा मत बोलना, यहाँ डाकू, चोर और तस्कर भी नेता बन रहे हैं, हाड़ी लोगों को नेता बनने में क्या दोष है? साला ब्राह्मणगीरी दिखाता है। तुम्हारे जैसे टीका-चंदन लगानेवाला कितने ब्राह्मण अछूत जाति की स्त्रियों के पीछे कुत्तों की तरह दौड़ते हैं और भूख मिटाने के बाद मूँछ पर हाथ फेरते हुए अपनी जाति को श्रेष्ठ बताकर इन स्त्रियों को खदेड़ देते हैं। तुम लोग पाप करते हो, उस पाप को छिपाने के लिए धर्म-कर्म करते हो, भगवान का नाम लेते हो, ऊपरी दिखावे के लिए माला जपते हो। तब तुम्हें भला आदमी कैसे कहा जाए?”

बाबा की दोस्ती बहुत सारे लोगों के साथ थी, इसलिए दस-पंद्रह दिन तो रूखा-सूखा भी चल गया। इसके बाद एक और मुसीबत का सामना भी हमें करना पड़ा। जब पेट के लिए ही दाना नहीं जुटता है, तो पहनने-ओढ़ने की क्या बात की जाए? एक दिन माँ जैसे-तैसे फटी हुई साड़ी पहनकर बैठी थी, तभी एक पंजाबी ड्राइवर गुरूवचन सिंह ने माँ को देख लिया। उसी दिन से माँ उस पंजाबी ड्राइवर की रखैल बन गई। बाबा उन दिनों रेलवे यार्ड में छोटी-मोटी चोरी किया करता और मुझे भी ऐसा करने के लिए कहता, किंतु मैंने मना कर दिया। माँ भी बीच-बीच में बाबा को समझाती, तुम चोरी मत किया करो। तब बाबा कहता कि जहाँ खाने के लिए कुछ नहीं है, कुछ काम नहीं मिलता, तो आखिर में कर भी क्या सकता हूँ?

“तुम्हारी माँ उतनी बुरी नहीं है”, बाबा ने उस दिन शाम में कहा, “अभी भी वह हमसे उतना ही प्यार करती है, दो-चार रुपये के लिए उस पंजाबी से सम्बन्ध बनाया हो, यह अलग बात है।”

माँ बीच-बीच में मटन, भात लाती और बीस-पचीस रूपये भी बाबा के हाथ पर धर देती। बाबा माँ की तरफ कृतज्ञता भरी आँखों से देखते। माँ बाबा को समझाते हुए कहती, “मेरा शरीर भले ही पंजाबी इस्तेमाल कर ले, किंतु मन पर तुम्हारा ही अधिकार है। मैं मुन्ना का जीवन सँवार दूँगी।”

भला, मेरा क्या जीवन सुधरता, वह पंजाबी माँ को लेकर दिल्ली चला गया।

मैं छोटा-मोटा काम करने लगा और बाद में एक आर्केस्ट्रा ग्रुप में बांसुरी बजाने लगा। छुट्टी के दिनों में मैं रघुबाबू की दुकान पर चाय-बीड़ी के लिए चला जाता। रघुबाबू दुकान पर अपनी बेटी पिंकी को बिठाकर दूसरे काम के लिए चला जाता। पिंकी देखने में गोरी थी, जिसकी बड़ी-बड़ी नीली आँखें थीं। वह मन ही मन मुझे चाहने लगी थी, देखने पर धीरे-धीरे मुस्कराती, चाय देते समय अक्सर उसके हाथ मुझसे छुआ जाते तो वह खुश हो जाती। मुझे लगने लगा कि मुझे भी पिंकी से प्यार हो गया है। एक दिन उसने मुझे बीड़ी पीते हुए देखा तो बोलने लगी- “इतना बीड़ी पीते हो, कलेजा जल जाएगा।”

मैं बोला- “कलेजा मेरा जलेगा, तुम्हें इतनी पीड़ा क्यों होती है?”

तो पिंकी बोली, “नहीं रे! बीड़ी अच्छी चीज नहीं है, मुँह से गंध आती है, बीड़ी पीनेवाले लोग मुझे अच्छे नहीं लगते, बीड़ी पीकर मेरे काका खाँसते हैं। मेरी कसम खाओ कि तुम यह गंदी चीज नहीं पियोगे।”

मैंने जब उसकी तरफ देखा, तो उसका मुँह लाज से गुलाबी हो गया। तब मुझे पूरी तरह अहसास हो गया कि पिंकी मुझसे प्यार करती है। इसके बाद वह मुझे दुकान पर खास चीजें बनाकर खिलाती और जब उसके बाबा नहीं होते तो पैसे भी नहीं लेती, कहती- “मैं तुम्हारी हूँ, तो यह बीच में पैसा कहाँ से आ गया, तुम्हारा पैसा क्या मेरा पैसा नहीं है? इसे संभाल कर रखो, किसी दूसरी चीज में काम आएगा। हमारा छोटा-सा घर होगा, इसमें छोटी-सी एक रसोई होगी, छोटा-सा एक अपना कमरा होगा, छोटे-से आहाते में बहुत सारे रंग-बिरंगे फूल महकेंगे।”

और, तब मैंने भी पिंकी से अपनी बात जोड़ते हुए कहा कि “छोटे से कमरे में मैं और तुम होंगे, जहाँ तुम्हारा विशाल हृदय होगा।”

पिंकी झरने की तरह खिलखिलाती और कहती, “तुम मुझे इतना सिर पर मत चढ़ाओ, किसी की नजर लग जाएगी।”

जब कभी मैं नहीं जाता, तो मुँह फुला लेती और घंटों नखरे करती। फिर झरने की तरह खिलखिलाकर हँसने लगती और कहती- “तुम्हें एक दिन भी नहीं देखती हूँ तो थोड़ा भी अच्छा नहीं लगता।”

दोपहर में एक दिन पिंकी अकस्मात् हड़बड़ाते हुए आई और बोली- “मैं सब कुछ छोड़ आई, चलो। हम लोग यहाँ से कहीं भाग जाएँ।”

मैंने उसे समझाया, “भागकर हम जाएँगे कहाँ? तुम मेरे पास रहो, जो कुछ भी करना है, मैं करूँगा।”

आर्केस्ट्रा ग्रुप के एक साथी ने हमारी शादी की व्यवस्था कर दी। दूसरे दिन पुलिस हमारे घर आई और हमें थाने ले गई। तीन दिन हमें हिरासत में रखा और जमकर पिटाई की। हमने पुलिस को लाख समझाया, विवाह के समय जितने भी फोटो खींचे गए थे, उसे दिखाया और पिंकी भी तो उन्नीस की थी, फिर भी पुलिस एक नहीं मानी। मेरे पास उन्हें घूस देने के लिए पैसे नहीं थे, तब पिंकी ने बड़ा बाबू को समझाते हुए कहा- “मैं म्युनिसिपल प्राईमरी स्कूल में तीसरे क्लास तक पढ़ी हूँ, अगर मैं तुम्हें नाबालिग लगती हूँ तो वहाँ से सार्टिफिकेट मँगा सकते हैं।”

पुलिस ने देखा कि अब कोई चारा नहीं है, तब थाना बाबू ने कहा, “अच्छा देखता हूँ।”

पिंकी के ऊपर छोटे बाबू की नजर गई और उसने बड़े बाबू को कहा- “देख रहे हैं न सर, क्या बढ़िया माल है! इसे बनाने वाले ने बड़ी मेहनत से गढ़ा है और बिल्कुल रसगुल्ले जैसी है। आज की रात के लिए यह व्यवस्था ठीक है।”

उसके बाद उन लोगों ने आपस में क्या बातें की, मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया।

जब शाम हो गई तो पिंकी के ऊपर कहर टूटा, थाना बाबू चिल्ला रहे थे- “साली, नखरा करती है, जब तू उस हाड़ी का हाथ पकड़ी थी, तब शर्म नहीं आयी थी। अगर तभी तुझे शर्म आती है, तो ला मैं इस शर्म का लबादा हटा दूँ।”

पिंकी गरजते हुए बोली- “मुंह संभाल कर बात करो, हमारी कोई इज्जत नहीं है?”

थाना बाबू गुर्राते हुए बोले- “अब नाटक बंद कर। साली छिनाल हाड़िन इज्जत की बात करती है।”

गुस्से में पिंकी का मुँह लाल हो गया, नागिन की तरह फुफकारते हुए बोली- “मैं तो छिनाल हूँ, लेकिन तुम जैसी ऊँची जातियों में भी भला कौन-सा शुद्ध रक्त बहता है? तुम लोग क्या पुण्य वृक्ष के फल हो। तुम्हारे घर की बेटी-बहुओं ने चोरी छुपे कितनी बार पेट गिराया है, उसका तुम्हारे पास हिसाब है?”

“चुप बे साली।”

थाना बाबू के जूते की मार खाकर पिंकी चीत्कार उठी- “ओह! माई, मैं तो मर ही गई।”

थाना के अन्य चमचे वहाँ खड़े होकर यह सब तमाशा देख रहे थे। यह सब मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ और रेलिंग तोड़कर मैं बाहर आ गया। मेरे हाथ में रेलिंग की एक छड़ी थी और मैंने उसे थाना बाबू के सिर पर दे मारा। यह घटना अप्रत्याशित थी, किसी ने नहीं सोचा था कि ऐसा होगा। सब चिल्लाने लगे, “पकड़ो।”

लेकिन अब पिंकी शांत हो गई थी। उसके मुँह की तरफ देखा, तो चेहरे पर एक तृप्ति का भाव था। मेरे दोनों हाथ अपने आप उसकी तरफ बढ़ गए। बाहर से एम्बुलेंस की आवाज आ रही थी। लहुलूहान बड़ा बाबू पर नजर पड़ते ही पिंकी फिर से चिल्ला उठी- “साला! बड़ी जाति! बड़ी जाति! जितने भी बड़ी जाति के लोग हैं, दिन भर में पचास बार अपनी जाति बदलते हैं। ये सब के सब अस्पृश्य जाति की सुंदर बहू-बेटी को बहन-बहन कहकर अपना उल्लू सीधा करने की ताक में रहते हैं। काहे का बड़ी जाति?”

मैंने देखा कि पिंकी अब बिल्कुल शांत थी। उसके ओठों पर विजय की मुस्कान तैर रही थी। उसके चेहरे का भाव ऐसा था मानो अब आशा की कई किरणें फूट रही हैं।