उपस्थिति

मेरी उपस्थिति ऐसी रही
कि अनुपस्थित ही रहा सदा
प्राथनाएँ मुझसे निकल कर
मुझमें समाती रहीं
और मौन ही रही मेरी सबसे सार्थक परिभाषा

भाषा में अव्यक्त रहा
और बोलकर कई-कई बार खुद को नष्ट किया
समझदारों की तरह जीने से बचने की जिद्द में
समझदारी ही हाथ लगी हर बार

जीवन भर दुहराई जाती रही
एक ही कत्थई त्रासदी
और मैं एक ही बिन्दु पर
हर बार कील की तरह ठोक दिया गया

जब जलेगी मेरी चिता तो
अलिखित प्रेम पत्र महकेंगे
धुएँ की जगह तुम्हारी स्मृतियाँ उड़ेंगी आकाश में
वर्षा होगी और बदल गरजकर कहेंगे
तुमने मुझे सदैव ग़लत ही समझा
तुम मुझे कभी नहीं समझे!!

पीड़ा कुछ नहीं है
सिवाय साँस और धड़कन के

मैंने हर आखिरी बात इसलिए कही
कि पहली बात दोहरा सकूँ।