उसके नाम की प्रतिध्वनि
किसी स्पन्दन की तरह
मन की घाटी में
गहरी छुपी रही
और मैं एक दारुण हिज्र जीती रही

वेदना, व्याकुलता के मनोवेगों में
त्वरित बिजुरी की तरह उसका प्रतिबिम्ब
हवाओं में कौंध जाता
और आँखों की मेड़ें
नेत्रजल को तिरस्कृत कर देतीं

मेरे ध्यानाकर्षण के लिए
उसने छोड़ी थीं
ब्रह्माण्ड में असीम सम्भावनाएँ
तब, शब्दातीत बोल सुनकर
प्रस्फुटित हुई प्रेम की पहली कली
जिसकी सुवास
मेरी पर्णकुटी से उठकर
महकाती रही सारे अरण्य को

वो प्रेयस
अनिद्रा को भी उत्सव बना देता
और उसकी परोक्ष उपस्थिति
अन्तःकरण में उठी रहती
किसी संगीत कोविद के आलाप की तरह

उसके संग सहचार का वहन
शब्द, अर्थ, विवेचनाएँ
या भाषा के यान
कभी न कर पाए
और मैं निश्चल, निमग्न
समय की नदी में पैर डुबाए
कोशबद्ध करने का दुःसाहस करती रही
उसके अनुराग की पाण्डुलिपि को
जो आकाश से भी अधिक विस्तृत थी

अन्ततः एक दिन
‘मेरे होने’ के वृहत पर्वतशृंग
विध्वंसित हो गए
और शेष बचा रह गया
एक जंगली श्वेत पुण्डरीक!

***

निर्मला गर्ग की कविता 'मैं सरल होना चाहती हूँ'

किताब सुझाव:

अनुजीत इक़बाल
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