विजय ‘गुंजन’ की लघु कथाएँ

डॉ विजय श्रीवास्तव लवली प्रोफेशनल यूनिवसिर्टी में अर्थशास्त्र विभाग में सहायक आचार्य है। आप गांधीवादी विचारों में शोध की गहन रूचि रखते हैं और कई मंचों पर गांधीवादी विचारों पर अपने मत रख चुके हैं। आपकी रूचि असमानता और विभेदीकरण पर कार्य करने की है। हिन्दी लेखन में विशेष रूचि रखते हैं और गीत, हाइकु और लघु कथा इत्यादि विधाओं में लिखते रहते हैं। विजय का ‘तारों की परछाइयां’ काव्य संग्रह शीघ्र प्रकाशित होने वाला है |

विजय फगवाड़ा पंजाब में रहते हैं और उनसे vijaygunjan1986@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है। पढ़िए उनकी तीन लघु कथाएँ!

‘खांसी और खामोशी’

रात के ग्यारह बजे थे। रेल के स्लीपर क्लास के डिब्बे में एक बूढ़े व्यक्ति की खाँसी से सह-यात्रियों की नींद में बाधा पड़ रही थी। बूढ़ा व्यक्ति विचलित भी लगा रहा था और सफ़र भी अकेले कर रहा था। उसे प्यास भी लगी थी। दस मिनट बाद किसी स्टेशन पर ट्रेन आकर रुकी। वह पानी लेने नीचे उतरा कि तभी भयानक हृदयाघात हुआ और उसकी साँसे थम गई। सहयात्री भी भौचक्के से रह गए। उसके शव को ट्रेन में उसी डिब्बे में चढ़ाया गया। यात्रियों के चेहरों के रंग अब बदल से गए थे। थोड़ी देर पहले जो लोग उसकी खाँसी से परेशान थे, अब उसी खाँसी को याद कर रहे थे। नींद में बाधा अब खाँसी के बजाय उसकी खामोशी डाल रही थी। बूढ़ा अगर कहीं खांस देता तो लोग अब चैन की नींद सो सकते थे।

‘धारणा’

मेरे बगल में रहने वाले दुबे जी बहुत ही धनी आदमी हैं, भरा खाता-पीता परिवार है उनका। उनके घर में एक कुतिया भी है जिसका नाम नैरी है। एक दिन मैनें उसे रात की बची हुयी रोटी खाने को दी तो दुबे जी ने मुझे टोका- इसे बासी मत खिलाया करो, यह बीमार पड़ जायेगी। मैंने सोचा कि यह दुबे जी कितने भले आदमी हैं, जो जानवरों का भी कितना ख्याल करते है।

अगले दिन जब शाम को मैं घर लौटा तो देखता हूँ, कि दुबे जी के घर के बाहर काफ़ी भीड़ जमा थी। मैंने पास जाकर पता किया तो मालूम हुआ कि कालोनी में रहने वाले रिक्शा चालक कल्लू का दस बरस का बेटा नन्दू दुबे जी के यहाँ ब्रेड खाने के बाद बीमार हो गय़ा था। डाक्टरों के अनुसार ब्रेड पाँच-छः दिन पुरानी फ़ंफ़ूदी लगी हुई थी और वो जानवरों के खाने लायक भी नहीं थी। तभी अचानक मेरी नजर दुबे जी की कुतिया नैरी पर पड़ी जो बड़े चाव से दूध-ब्रेड खा रही थी। उसको देखने के बाद दुबे जी के प्रति मेरी पुरानी धारणा अब बदल चुकी थी।

‘कोटे वाला का मकान’

नए शहर में मकान ढूढ़ते हुए उसे तीन दिन हो गए थे। कोई भी मकान उसे भा नहीं रहा था। थक हार कर उसने एक ब्रोकर से बात की, कुछ उम्मीद तो दिखलाई ब्रोकर ने उसे और कल सवेरे बुलाया। तंग गलियों में एक दुमंजिला इमारत में ऊपर के दो कमरे खाली थे। नीचे मकान मालिक का परिवार रहता था। मकान उसे इस बार भा गया था। पाँच हजार रुपया मासिक किराये पर बात तय हो गई। अगले दिन शिफ्ट करने की बात भी हो गई। लेकिन तभी उसने मकान मालिक से उनका नाम और ओहदा पूछा। पता लगा कि उनका नाम ………सिंह है और वे आर्मी से रिटायर्ड हैं। वो मकान मालिक से कल आकर शिफ्ट कहने की बात कहकर चला गया। मकान मालिक इंतजार करता रहा लेकिन वो नहीं आया। ब्रोकर को भी कुछ समझ नहीं आया। ब्रोकर ने जब उसे फोन किया तो उसने कहा “उनका नाम …….सिंह था, पता नहीं कही कोटे वाले सिंह हो तो। …नहीं नहीं मैं किसी कोटे वाले के घर में नहीं रह सकता, आप कुछ महँगा मकान ढूँढिए मगर आप खुद समझदार है..”।

नया मकान सात हजार में अगले दिन मिल भी गया। इस बार मकान मालिक का नाम ……दुबे था। कोटा वाला होने की शून्य संभावना थी। उसने अपने घर में ये बात बताई तो माता-पिता ने राहत की सांस ली कि चलो मकान मालिक ऊंची जाति से है। चलिए अब आपको यह भी बता दें ये हैं कौन? माननीय समाज विज्ञान के शोध छात्र हैं जो कि ‘भारत में जाति प्रथा उन्मूलन’ पर किताब लिख रहे हैं। अब ये चैन से किताब लिख सकेंगें क्योंकि उनकी नजर में अब वो सही मकान में है। कोटे वाले लोगों का मकान उनके लिए वैसे ही अशुभ होता है जैसे कोटे वाले लोग। शर्म है शर्म है। ये आपको हर जगह दिखाई देंगे अपने आस पास और आप सवर्ण है तो खुद में भी।

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चित्र श्रेय: Karthik Chandran