विशाल भारद्वाज को हम निर्देशक, संगीतकार और गीतकार के रूप में जानते हैं, लेकिन विशाल फ़िल्मी गीतों के अलावा नज्में और ग़ज़लें भी लिखते हैं। उनके पिता राम भारद्वाज भी बहुत अच्छे कवि थे। आज पोषम पा पर पढ़िए उनकी कुछ नज्में/ग़ज़लें-

1

अकेला छोड़ के घर में न मुझको जाया करो
ऑन होता नहीं है टीवी तुम न देखो तो
और ताला भी कहाँ खुलता है अलमारी का
तुम्हारे जाते ही नल को ज़ुकाम होता है
टपकने लगता है टप टप ये बदतमीज़ मुआ
हवा से मिल के परदे रात भर डराते हैं
तमाम बत्तियाँ एसी भी और इंटरनेट
जाम हो जाते हैं सारे के सारे बेवजह
बेवजह चलने लगते हैं तुम्हारे लौटने पे
मेरे ख़िलाफ़ कई साज़िशें सी होती हैं
अकेला छोड़ के घर में न मुझको जाया करो..

2

बचपन में स्कूल की जब
बिन कारण छुट्टी हो तो
मारे खुशी के बच्चों में
कितना हल्ला होता है

बिलकुल वैसा शोरो-गुल
मेरे अन्दर होता है
जब मिलते हो अचानक तुम
आते जाते रास्तों पर..

3

एक आँधी थी आँगन उड़ा ले गई
मेरा घर-बार उस रोज़ सड़कों पे था
बूढ़ा बरगद उखड़ के ज़मीन पे गिरा
और जड़ें उसकी आकाश छूने लगी..

4

मैं अपने से काले कोसों दूर हुआ
सारी दुनिया में लेकिन मशहूर हुआ

मौसम शर्त लगाकर हार गया मुझसे
बादल बारिश करने को मजबूर हुआ

इंजन की सीटी पे पंछी चौंक पड़े
जंगल का सन्नाटा चकनाचूर हुआ..

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