‘व्यंग्य’ की कुछ परिभाषाएँ (भारतीय व विश्व चिंतकों द्वारा)

“व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है। विसंगति, मिथ्याचारों और पाखण्डों का पर्दाफाश करता है… अच्छा व्यंग्य सहानुभूति का सबसे उत्कृष्ट रूप होता है।” – हरिशंकर परसाई

 

“व्यंग्य सत्य की खोज नहीं, झूठ की खोज है। यही उसका पेंचदार रास्ता है। झूठ की खोज के सहारे या उसके बहाने ही यहाँ सत्य को पहचानने की प्रक्रिया चलती है।” – श्रीलाल शुक्ल

 

“व्यंग्य वह है जहाँ कहने वाला अधरोष्ठ में हँस रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठा हो, फिर भी कहने वाले को जवाब देना अपने को और भी उपहासास्पद बना लेना हो जाता है।” – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

 

“व्यंग्य का वास्तविक उद्देश्य सोसाइटी की बुराइयों, कमजोरियों और त्रुटियों की हँसी उड़ाकर पेश करना है, मगर इसमें तहजीब का दामन मजबूती से पकड़े रहने की ज़रूरत है, वरना व्यंग्यकार भड़ैती की सीमाओं में प्रवेश कर जाएगा।” – गुलाम अहमद ‘फुरकत’

 

“व्यंग्य एक ऐसी साहित्यिक अभिव्यक्ति या रचना है, जिसमें व्यक्ति तथा समाज की कमजोरियों, दुर्बलताओं, करनी व कथनी के अंतरों की समीक्षा अथवा निन्दा भाषा को टेढ़ी भंगिमा देकर अथवा कभी-कभी पूर्णतः सपाट शब्दों में प्रहार करते हुए की जाती है… व्यंग्य में आक्रमण की स्थिति अनिवार्य है।” – शेरजंग गर्ग

 

“हास्य के अभाव में व्यंग्य इतना कटु होता है कि वह मात्र चोट करता है। उसमें कोई नैतिक बोध नहीं होता। दया, करुणा, उदारता से वह विरहित होता है। युग की पूरी रीति-नीति पर अक्षम्य भाव से टूट पड़ता है।” – ए. निकोल

 

“व्यंग्यकार नैतिकता का ठेकेदार होता है, वह बहुधा समाज की गंदगी की सफाई करने वाला होता है।” – मेरिडिथ

 

“व्यंग्य में सामान्यतया नैतिक चिंता और किन्हीं तौर-तरीकों, विश्वास अथवा परंपरा में सुधार लाने की प्रबल आकांक्षा – दोनों ही भाव विद्यमान रहते हैं।” – हैरी शॉ

 

“व्यंग्य एक ऐसा शीशा है, जिसमें देखने वाले को अपने सिवा हर किसी का चेहरा नज़र आता है। यही कारण है कि संसार में व्यंग्य का स्वागत किया जाता है और बहुत कम लोग इससे आहत होते हैं।” – जोनाथन स्विफ्ट

 

“व्यंग्य पाठक को यह अहसास दिलाता है कि आप विजयी और शत्रु कमज़ोर है, शोचनीय है और आप उसे हँसी में उड़ा सकते हैं। इस तरह नैतिक स्तर पर आप शत्रु से श्रेष्ठ हो जाते हैं… इस तरह व्यंग्य की विजय नैतिक विजय होती है।” – ए. लूनाचार्स्की

 

“अपने साथियों के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार करने का मतलब होगा शत्रु के दृष्टिकोण को अपनाना। तो क्या हम व्यंग्य को ख़त्म कर डालें? नहीं। व्यंग्य का रहना हमेशा आवश्यक है। लेकिन व्यंग्य कई किस्म के होते हैं और हर व्यंग्य का रवैया अलग-अलग होता है। जैसे, अपने दुश्मनों के लिए व्यंग्य, अपने सहकर्मियों के लिए व्यंग्य, अपनी पाँतों के लिए व्यंग्य। हम सामान्य रूप से व्यंग्योक्ति का विरोध नहीं करते, लेकिन जिस चीज़ को हम ख़त्म करना चाहते हैं, वह है व्यंग्योक्तियों का दुरुपयोग।” – मावो त्से-तुंग

 

“व्यंग्य चेतावनी देता है कि मनुष्य वह खतरनाक जानवर है जिसमें मूर्खतापूर्ण कार्य करने की असीम क्षमता है। और यदि व्यंग्यकार द्वारा इस सत्य की अभिव्यक्ति कर दी जाती है तो बहुत पर्याप्त है। मनुष्य के गौरव का वर्णन कवियों का कार्य है।” – मैथ्यू हॉगर्थ

 

“व्यंग्य का कार्य मात्र रोशनी दिखाना है, रास्ता चुनकर देना नहीं। वह शराब की बुराइयों को सामने लाता है, शराब के स्थान पर क्या पीना चाहिए, यह नहीं सुझाता और न ऐसा करना उसका उद्देश्य ही होता है। व्यंग्यकार सीधे-सीधे सुधारक का कार्य नहीं करता बल्कि मूल्यों के पुनर्निर्धारण का मार्ग प्रशस्त करता है।” – नारमन फर्लांग