‘वो’ – विजय शर्मा

वो यूँ तो बेहद आम सा दिखने वाला लड़का था, लेकिन दिलो- दिमाग़ के जद्दो जहद ने उसके अंदरुन को वो गहराई अता की थी कि कोई भी आम सा शख्स उसे देख कर बिला शुबह यह कह सकता था कि वो उदास है। घर था, सड़कें थीं, गलियाँ भी थीं.. लेकिन ये सारे इंतज़ामात उसे न तो एक पल ठहरने का सुकून देते थे और न ही चलने का हौसला। वह दिन भर यहाँ- वहाँ भटकता और अक्सर किसी सुनसान जगह पर अपना वक़्त गुज़ारता। ज़रिया ए म’आश के लिये कभी बोझ ढोने का काम करता तो कभी किसी और का रिक्शा चला लेता। हाँ मगर कमाता सिर्फ उतना ही, जितने में उसे अगले वक़्त की रोटी और दो चिलम गाँजा मयस्सर हो पाए। घर में माँ थी, लेकिन वह अपनी माँ से भी बहुत कम गुफ्तगू करता। माँ अपनी ज़िन्दगी ख़ुद ही बसर करती। उसके ज़हन में दुनिया भर में वो सारे सवालात आते, जो कोई भी आम आदमी चाह के भी नहीं करेगा। मसलन ख़ुदकुशी के लिये कौन सा तरीक़ा सबसे तेज़ और कारगर है और किस तरीक़े में ख़ुदकुशी नाकाम हो सकती है, जिन औरतों को जला दिया जाता है, वो जलते वक़्त क्या सोचती होंगी! क्या उन्हें कश्मीर की ठंडी वादियों की याद आती होगी, जैसा कि फितरतन कोई भी दुखी इंसान अपने दुःख भरे लम्हों में सुख के दिनों (या जो दिन कम दुःख में गुज़रे हों) को याद करता है.. ग़ौरतलब है कि ये सवालात वो अपनी बेवकूफ़ी की बुनियाद पर करता, जिनके जवाब कोई भी दानिशमंद देना नहीं चाहेगा। उसने आग की जलन महसूस करने के लिये एक बार अपने दाँये हाथ के अनमिल को एक होटल के गर्म तवे पर रख दिया था। उसके बाद अगले पंद्रह- बीस दिनों तक उसकी जलन के बढ़ने घटने पर ग़ौर करता रहा। इससे उसे वक़्त गुज़ारने में काफ़ी मदद मिली थी। वह कभी कभी सोचता कि काश उसे पुलिस पकड़ के ले जाती। उस पे कई तरह के संगीन जुर्मों के इल्ज़ामात लगाए जाते। और वह इनकार करता। वह इनकार करता ताकि उसके बाद उसे जेल के किसी कमरे में ‘थर्ड डिग्री’ टॉर्चर किया जाता। उसे यह शौक़ तब हुआ जब उसने शहर के किसी टीवी दूकान में चल रहे हिटलर पर बनी फिल्म बाहर से खड़े खड़े देखी थी। पूरी फ़िल्म तो नहीं बस कंसंट्रेशन कैंप के कुछ हिस्से। हिटलर की छोटी मूँछ भी उसे काफ़ी पसंद आई थी। वो चाहता था कि उसे उसके होने की सज़ा मिले, ताकि वह दुनिया में रहने का क़र्ज़ अदा कर सके.. जब वह ख़ुद से पूरी तरह ऊब जाता तो किसी कब्रिस्तान में चले जाता। इसके लिये उसे कब्रिस्तान की दीवार फाँदनी होती थी, क्यों कि उसे दरवाज़े से ज़िन्दा तभी दाख़िल होने का मौक़ा मिलता  जब वह अपनी माँ के जनाज़े के साथ यहाँ आता। माँ के अलावा उसका इस दुनिया में कोई नहीं था। दीवार फांदने के बाद वह एक एक करके क़ब्रें गिनना शुरू’अ करता। कभी कोई नयी क़ब्र दिख जाती तो, वह बेहद जोश ओ खरोश के साथ उसके पास जाता। उसका दिल करता कि नयी क़ब्र की नर्म मिट्टी हटा कर देखे के उसके नीचे कौन मौजूद है.. यानि किसका बदन है लड़के का या लड़की का। ये भी सोचता कि अगर किसी को यहाँ ज़बरदस्ती या ग़लती से दफ़न कर दिया गया हो तो….! वह क़ब्र से कान लगाता और जाने क्या सुनने की कोशिश करता। कभी उसका जी करता कि वह एक ही पल में पूरी दुनिया तबाह कर दे। यह कैफ़ियत अक्सर उसके अन्दर तब पैदा होती, जब वह खाने के बाद होटल के मालिक को पैसे चुकाता। या कभी किसी ख़ूबसूरत जगह में दाख़िल होने से पहले उसे रोक दिया जाता। उसके जी में सवाल आता – ‘दुनिया में आज़ादी का तसव्वुर महज़ एक धोका है’। अगर उसने कभी यूटोपिया लफ्ज़ सुना होता तो इसका ही इस्तेमाल करता। जिस दुनिया में जीने की बुनियादी चीज़ों के लिये झगड़े हों वह रह के या न रह के क्या हो जाना है..!

कभी कभी भूले भटके अपनी महबूब का तसव्वुर करता। उसे गुमान गुज़रता कि दुनिया की सबसे बदसूरत या सबसे खूबसूरती लड़की ही उसकी महबूबा होगी। अपनी शबिस्ताँ के तसव्वुर से उसका कुँवारा बदन सिहर जाता और वह गाँजा पीने में लग जाता। कभी वह सोचता कि दुनिया की सारी लड़कियां उसकी बीवियां हैं और वह हर एक को छोड़ चुका है। एक दफ़ा एक कब्रिस्तान में उसने छुप कर किसी जवान लड़की को दफ़न होते देखा था। लड़की के हाथ पर कटे का निशान था। वह लड़की उसे आज तक की सबसे ख़ूबसूरत लड़की लगी। उसे यक़ीन हो गया कि उसकी महबूबा मर चुकी है। वह अक्सर उस लड़की की क़ब्र पर जाया करता। पर जल्द ही उसी क़ब्र के आस पास एक अधेड़ उम्र की आदमी को दफ़न होते देखा।  इसके बाद उसका मन इस बात से मायूस हो गया कि ज़मीन के नीचे ये आदमी उसकी महबूबा को छुएगा।

इधर कुछ दिन पहले एक बार रिक्शा चलाते हुए उसे सवारी की शक्ल में माँ और बेटा मिले। दोनों की बातों से उसे पता लगा कि बेटे का तोहफा उसकी माँ को बेहद पसंद आया है.. और माँ बहुत खुश है। सवारी उतारने के बाद उसे अचानक घर जाने की सूझी। यह सूझ कौन से लम्हे में बेचैनी में बदल गयी.. पता नहीं… वो अपनी माँ के लिये कोई तोहफा लेके जाना चाहता था। उसे याद आया कि सवारी ने अपनी माँ को साड़ी तोहफे में दी थी। वो साड़ी खरीदने निकल पड़ा। उसके पास महज़ सौ रूपए थे। उसे जब तीन चार दुकानों से दुतकार कर भगा दिया गया तो फिर से उसके अन्दर वही कैफ़ियत पैदा हुई की वह दुनिया तबाह कर डाले। वह लगातार घूमता रहा। एक के बाद एक दूकान बंद होने लगी थी। तभी अचानक उसे ऐसी दूकान नज़र आई जहाँ एक एक कर सफ़ेद और काले कपड़े टंगे हुए थे। ये दूकान कभी बंद नहीं होती थी, क्यों कि मरने का वक़्त तय नही होता। उसे ख़ुशी हुई। उसे एक बात बेहद सुकून देती थी कि हर इन्सान की मौत तय है.. भले वक़्त तय हो न हो। कफन लेकर वह अपने घर की तरफ इस तरह से भागा जैसे आज ही उसकी माँ की  मौत होने वाली है (दरअसल वह माँ से मिलने की ख़ुशी थी)।

वह अपने घर के पास पहुँचा। आधी रात और दरवाज़ा खुला। अन्दर एक बहुत हलकी सी रौशनी थी। घर में दाख़िल होते ही उसके सामने एक खौफनाक मंज़र था। कोई शख्स उसकी  माँ पर चाकू से हमले कर रहा था। ख़ूब मुमकिन था कि वह एक चोर है, क्यों कि घर के सारे सामान बिखरे पड़े थे। वह इसके दाख़िल होते ही घबरा गया। और एक झटके में उसे धक्का देकर निकल गया। वह सन्न खड़ा रहा.. जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो। चाकू अभी भी सीने में धँसा हुआ था। वह अपनी माँ के पास गया..उसकी माँ की नज़रें उसकी तरफ मुड़ी। वह मुस्कराहट इंतज़ार ख़त्म होने की मुस्कराहट थी। माँ ने उसकी हाथ की  तरफ देखा। उसने कहा- “माँ तेरे लिये है”। यह समझे बग़ैर कि उसके हाथ में क्या है उसकी माँ के चेहरे पर वह ख़ुशी झलकी जो किसी भी माँ को उसके बेटे से कोई तोहफा पाकर होती है। माँ की पलकों से पानी की आखिरी बूँद गुज़री और साथ ही माँ भी। वह लाश पर कफ़न डाल कर जस का तस बैठा रहा। सुबह मोहल्ले वालों की अक्लमंदी ने यह तय किया कि उसने ख़ुद ही अपनी माँ का क़त्ल किया है। उसे हालाँकि कब्रिस्तान जाने का मौक़ा मिला। तद्फीन के बाद उसे जेल ले जाया गया। जेल जाते वक़्त उसे महसूस हुआ कि अब उसके सपने एक एक कर पूरे होंगे। उस पर झूठा मुक़द्दम चलाया जायेगा। उसकी पिटाई होगी.. शायद फाँसी भी हो और अगर फांसी न हुई तो, वह दुनिया तबाह करने की तरकीब सोचेगा। यह सोचते हुए वह मुस्कुरा रहा था…

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