Om Prakash Valmiki

यह अंत नहीं

गाँव की ठहरी हुई ज़िन्दगी में एक भूचाल-सा आ गया था। जहाँ ऊपरी सतह पर शांति और ठहराव दिखाई देता था, वहीं निचली सतह पर तेज हलचल थी। जो ऊपरी सतह को तोड़ देने के लिए छटपटा रही थी। लेकिन ऊपरी सतह इतनी सुदृढ़ थी कि उसे तोड़ पाना आसान नहीं था।

बिरमा ने इस ऊपरी सतह पर चोट की थी। यह जानते हुए भी कि उसकी चोट बेअसर होगी। दूसरों की तरह वह चुप नहीं रह पाई थी। शायद रह भी जाती यदि उसने किसन और उसकी मित्र-मंडली के बीच होने वाली बहसें न सुनी होतीं। इसी जद्दोजहद ने उसके अंतर्मन में विश्वास जगा दिया था।

तमाम अभावों के बावजूद मंगलू ने किसन को कॉलेज की पढ़ाई के लिए शहर भेजा था। महीने दो महीने में किसन और उसकी मित्र-मंडली गाँव आती थी। शहर के खुले माहौल ने किसन की सोच और मानसिकता को प्रभावित किया था। वे जब इकट्टे होते तो किसी न किसी मुद्दे पर ऊँची आवाज में घंटों बहस करते थे। बिरमा की समझ में कुछ भी नहीं आता था। वह अक्सर किसन से पूछती थी, “तुम इतनी लड़ा क्यूँ करो?” किसन हंसकर कहता, “बुद्धू, यह लड़ाई नहीं बातचीत है।”

बिरमा हैरान रह जाती, “यह कैसी बातचीत है? गाँव में तो इसे लड़ाई ही कहते हैं।” इस बातचीत की वह अभ्यस्त हो गई थी। उनकी बातचीत के कुछ टुकड़े उसे याद रहने लगे थे। आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, स्वाभिमान, संघर्ष, संगठन, मात्र शब्द नहीं रह गए थे उसके लिए।

वह इनके अर्थ जानना चाहती थी। किसन से पूछती तो वह समझाने की कोशिश करता, लेकिन बिरमा को लगता कि वह समझ नहीं पा रही है। वह मन मसोस कर रह जाती थी। ऐसे क्षणों में उसका लगता, काश! उसे भी बापू ने स्कूल भेजा होता। किसन की तरह वह भी कॉलेज जाती तो इतनी बड़ी-बड़ी बातें उसकी समझ में जरूर आतीं।

उसे लगता किसन और उसके दोस्त ज्यादा पढ़े-लिखे हैं। उनके जैसी बातें करने वाला गाँव में कोई भी नहीं है। अपनी बस्ती की तो कोई बात ही नहीं, बसीटों में भी ऐसा कोई नहीं है।

धान कटाई के उमस भरे दिन थे। मंगलू और सरबती के साथ बिरमा भी धान कटाई के लिए जाती थी। उस रोज वे तेजभान के खेत में धान काटने गये थे। बस्ती के पन्द्रह-बीस स्त्री-पुरुष कटाई पर लगे थे। साँझ होने से पूर्व ही धान कटाई, छंटाई आदि का काम पूरा कर लिया गया था। धान बोरों में भरा जा रहा था।

मंगलू, सरबती और बिरमा को एक-एक गट्ठर धान मिला था। एक गट्ठर बिरमा के सिर पर रखते हुए मंगलू ने कहा, “तू घर जा। साँझ हो रही है… घर जाके रोट्टी-पाणी देख लियो… हमें आणे में देर हो जागी। बुग्गी में धान लादके ही आणा होगा। तू चल।”

बिरमा अकेली ही चल पड़ी थी। बाकी मजदूर वहीं रहे गए थे। बोझ भारी था। रास्ता कच्चा एवं उबड़-खाबड़ था। संभल-संभलकर चलना पड़ रहा था। गाँव काफी दूर था। गाँव से पहले आम का बगीचा था। उसके साथ-साथ पगडंडी थी। सुनसान रास्ते पर चलते हुए बिरमा का जी घबराने लगा था। वह जल्दी-जल्दी कदम उठाकर चलने का प्रयास कर रही थी। बोझ के कारण चलने की गति धीमी थी।

बगीचे में सचीन्दर दिखायी दिया। उसे वहाँ खड़ा देखकर बिरमा सहम गई। धान की कटाई के वक्त भी लगातार उसे घूर रहा था। बिरमा ने उसकी नजरें भाँप ली थीं। उसने जल्दी-जल्दी कदम उठाने की कोशिश की, ताकि वह बगीचे की ओर से खुले रास्ते पर पहुँच जाए।

कुछ कदम चलने के बाद ही उसे लगा जैसे सचीन्दर उसके पीछे-पीछे आ रहा है। उसकी धड़कने बढ़ रही थीं। बोझ के कारण वह मुड़कर देख नहीं पा रही थी।

सचीन्दर ने तेजी से आगे बढ़कर उसका रास्ता रोक लिया। बेहयायी से बोला, “सिर पर इतना बोझ है, थक गई होगी। थोड़ा-सा सुस्ता ले…” बिरमा ने आग्नेय नेत्रों से उसे घूरा। बिरमा कुछ कहे उससे पहले ही सचीन्दर ने उसके गालों को छुआ। उसके स्पर्श से बिरमा के शरीर में जैसे बिजली-सी कौंध गई। क्षण भर को तो वह सहम गई थी। सचीन्दर ने जैसे ही उसके सीने की ओर हाथ बढ़ाए, बिरमा ने पीछे हटने की कोशिश की, सन्तुलन बिगड़ा लेकिन बिरमा ने सिर पर रखा गट्ठर सचीन्दर के ऊपर गिरा दिया। अचानक इस हमले से वह गड़बड़ा गया और गिर पड़ा। जैसे ही उसने उठने की कोशिश की, बिरमा ने पूरी ताकत से उसकी जांघों के बीच वार किया। लात का प्रहार इतना तगड़ा था कि सचीन्दर उठ नहीं पाया। किसी तरह लड़खड़ाकर खेत में घुसकर गुम हो गया। बिरमा मेंड़ पर खड़ी थी, उसे भागता देखकर चिल्लाने लगी। उसने पहले ही झटके में सचीन्दर की बेहयायी को कायरता में तब्दील कर दिया था।

कुछ देर उसी क्रोधित मुद्रा में खड़ी रही। गुस्से में उसका शरीर काँप रहा था। गट्ठर गिरने से धान बिखर गए थे। जिन्हें देखकर बिरमा का जी दु:खी हो गया। उसके अन्तर्मन से सचीन्दर के लिए बद्दुआएँ निकलीं।

दूर खेतों से लौटती स्त्रियों की आवाज बिरमा को सुनायी दी। वह गट्ठर पर बैठकर उनका इन्तजार करने लगी।

बिरमा को रास्ते के बीचों-बीच इस तरह बैठा देखकर उन्होंने पूछा, “अरी क्या हुआ?”

कुछ नहीं… यह बोझ गिर गया… करके हाथ लगवा दो…” बिरमा ने भीतर उठते शोर को छिपाकर कहा।

वह गट्ठर उठवाकर उनके पीछे चल पड़ी। घर लौटकर भी उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ था। किसन घर पर ही था । बिरमा का उखड़ा हुआ मूड देखकर उसने पूछा, “क्या हुआ?”

“कुछ नहीं!” बिरमा ने सहजता से उत्तर दिया लेकिन उसे रह-रहकर रोना आ रहा था, वह किसन के सामने आने से बचने का प्रयास कर रही थी।

मंगलू और सरबती को आने में देर हो गई थी। माँ को देखते ही बिरमा की रुलाई फूट पड़ी, उसे इस तरह हलकान होते देखकर सरबती का हृदय काँपने लगा। वह किसी अज्ञात आशंका से डर गई थी। उसे घर के भीतर ले गई।

“क्यूँ री… क्या हुआ… रो क्यूँ रही है?” सरबती ने पूछा।

मंगलू धान के गट्ठरों को सुव्यवस्थित करने में लगा था। किसन उसका हाथ बँटा रहा था।

बिरमा की हिचकियाँ बँध गई थीं। सरबती के ढाढ़स देने पर उसने सारा किस्सा कह सुनाया। सरबती अवाक रह गई थी। उसे लगा जैसे किसी काले साये ने उसके परिवार पर कुदृष्टि डाल दी है। वह गुमसुम हो गई थी। आँखों के भीगे कोरे आँचल से पोंछते हुए उसने बिरमा को समझाने की कोशिश की। उसे ऊँच-नीच समझाई, बदनामी का डर दिखाकर चुप रहने की सलाह दी। माँ की एक-एक कोशिश बिरमा को कांटे की तरह बींध रही थी। उसे हर सलाह, डर और बेबसी का अक्स दिखा रही थी। उसके भीतर एक भीषण तूफान हिलोरें मारने लगा था। वह चुपचाप मां का एक-एक लफ्ज़ सुन रही थी। बिना कोई प्रत्युत्तर दिए उठी और चूल्हा जलाने बैठ गई।

चूल्हे की धधकती आग ने उसके अंतस् की जलन को और अधिक सुलगा दिया था वह बेबसी से निजात पाना चाहती थी। उसने अपने आँसू पोंछ लिए थे।

मौका देखकर सरबती ने मंगलू से पूरी बात कह दी। मंगलू के पाँव-तले की जमीन खिसक गई। उसने एक गहरी साँस खींची। रात के गहरे अंधेरे में अपनी पीड़ा को घोलने की चेष्टा करने लगा।

कुछ देर की खामोशी के बाद उसने सरबती से कहा, ‘बिरमा को ठीक से समझा देना। किसन से कोई जिक्र ना करे।”

दोनों के बीच फिर से गहरा सन्नाटा पसर गया था। दोनों अपने-अपने भीतर उमड़ते चक्रवात की ध्वनि सुन रहे थे। अंधेरे की सघनता उनके भीतर समा गई थी। मंगलू ने गहरी सोच से बाहर आते हुए कहा, “बिरमा की माँ इब एक मिलट के लियो बी उसे अपणी आँखों से दूर ना करियो… टेम बुरा आ गिया है… किसी तरियो इसके हाथ पीले होजां तो कुछ चैन मिलेगा….।” उसकी आवाज किसी अंधेरी गुफा से छन-छनकर आ रही थी।

तेजभान के खानदान के चरित्र को मंगलू अच्छी तरह जानता था। सचीन्दर की हरकतें किसी से छिपी हुई नहीं थीं। बाप-बेटे दोनों की नजर में किसी दूसरे के मान-सम्मान का कोई मतलब ही नहीं था। सचीन्दर का नाम सुनते ही मंगलू आतंकित हो गया था।

रात भर मंगलू, सरबत्ती और बिरमा अपने-अपने ढंग से समस्या का समाधान खोजने की कोशिश कर रहे थे। बिरमा ने पूरी रात जागकर काटी थी। सुबह जब वह उठी तो उसकी आँखे सूजी हुई थीं। चेहरा उदास था। वह घर के काम में लग गई थी। मंगलू भी जल्दी उठकर जंगल-फरागत के लिए चला गया था। सरबती खाली घड़े लेकर कुएँ से पानी लेने चली गई थी। बिरमा ने उन दोनों के जाते ही किसन को जगाया।

बिरमा ने किसन को कल की पूरी घटना से अवगत करा दिया। वह रात भर जागकर अपने आपको हर एक स्थिति के लिए तैयार कर चुकी थी। उसकी आँखों में आँसू की जगह गुस्सा और नफरत भरी हुई थी।

सचीन्दर की इस हरकत पर किसन का खून खौल उठा था। जिस्म में जैसे अंगारे भर गए। थे।

मंगलू के बाहर से लौटते ही वह बिफर पड़ा, मंगलू हक्का-बक्का रह गया था। बिरमा किसन के ठीक पीछे खड़ी थी। मंगलू ने पूरी ज़िन्दगी झुके-झुके गुजारी थी, किसन अब उसे सीधा खड़ा होने के लिए कह रहा था। जबकि सीधा खड़ा होने की उसे आदत ही नहीं थी। मंगलू को लगा, जिसका डर था वही हुआ। जवान लड़का है। कुछ उल्टा-सीधा कर बैठे।

उसने दयनीय होकर कहा, “ना किसन… जबान खोलोगे तो बुरा हो जागा। इबी तो बात घर में है, कल पूरे गाँव-देहात में फैलेगी… बदनामी होगी। बिरमा के माथे पे दाग लग जागए… चुप रहना ही ठीक है…”

मंगलू की बात बीच में ही काटकर किसन बोला, “बापू ! बिरमा का दोष क्या है?…. जो उसे सजा मिलेगी। नहीं बापू….सचीन्दर को ही सजा मिलेगी…” किसन गुस्से में बाहर निकल गया। मंगलू ने रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं रुका।

किसन शहर आ गया था। उसने अपने साथियों को इकट्ठा करके घटना की जानकारी उन्हें दी, अपने बापू और माँ के डर की बात भी उसने खुलकर बताई, “अब, आप लोग बताओ… क्या करना चाहिए।” किसन ने सवाल किया।

विचार-विमर्श के बाद सभी की राय थी कि तेजभान ताकतवर आदमी है। उसके लड़के पर हाथ डालने का मतलब है आग से खेलना। सभी की राय थी कि सचीन्दर से सीधा टकराने की बजाय पुलिस की मदद ली जाए।

वे सभी थाने में रपट लिखाने गए थे। लेकिन इंस्पेक्टर ने रपट लिखने से मना कर दिया था। इस बात पर उनके बीच काफी गर्मा-गर्मी हो गई थी।

इंसपेक्टर ने कटाक्ष करते हुए कहा था, “छेड़-छाड़ी हुई है… बलात्कार तो नहीं हुआ… तुम लोग बात का बतंगड़ बना रहे हो। गाँव में राजनीति फैलाकर शांति भंग करना चाहते हो। मैं अपने इलाके में गुंडागर्दी नहीं होने दूँगा… चलते बनो।” कुछ क्षण उनके बाहर निकलने का इन्तजार किया गया। वे टस से मस नहीं हुए तो अजीब-सी मुद्रा बनाकर बोला, “फूल खिलेगा तो भौंरे मण्डराएंगे ही…” उसने बेशर्मी से खींसें निपोरीं। उसके इस तरह बोलने से किसन बौखला गया। उसने तिलमिलाकर कहा, “तमीज से पेश आइए।”

इंसपेक्टर का झन्नाटेदार थप्पड़ किसन के गाल पर पड़ा, “हरामी की औलाद ये डंडा पूरा उतार दूंगा… तू मुझे तमीज सिखाएगा…” इंसपेक्टर ने बिना देर किए सभी की धुनाई शुरु कर दी। अचानक हमले से वे हड़बड़ाकर इधर-उधर भागने लगे।

पिट-पिटकर वे थाने से बाहर आ गए थे। पुलिस के साथ उनकी यह पहली मुठभेड़ थी । कानून की किताबें रटने वाले भी बेबस हो गए थे। प्रवीण कानून के दूसरे वर्ष में था। उसके ही सुझाव पर वे थाने गए थे रपट लिखाने। लेकिन पहले ही झटके में चारों खाने चित्त पड़े थे। प्रवीण गहरी असमंजस की स्थिति में था। किसन स्वयं को दोषी मान रहा था। उसे लग रहा था, सब उसी के कारण हुआ। निराशा की हालत में वे सब साँझ से पहले ही गाँव आ गए थे।

गाँव पहुँचकर उनका गहन विचार-विमर्श हुआ। जिसमें यह तय किया गया कि बस्ती के लोगों को इस घटना की जानकारी देकर एकजुट किया जाए। ताकि गाँव में एक दबाव बन सके। सचीन्दर ऐसे हरकत करने से पहले कोई दस बार सोचे।

साँझ होते-होते बस्ती के तमाम बुजुर्गों और नौजवानों को एक जगह बुला लिया गया था। बस्ती के बीचों-बीच नीम का पेड़ और एक चबूतरा था। वहीं सब जमा हुए थे। किसन ने खड़े होकर सचीन्दर की हरकतों के बारे में बताया। जैसे ही सचीन्दर और तेजभान का ज़िक्र आया, सभी में सन्नाटा फैल गया था। सभी चुप्पी साधकर बैठ गए। किसन के बहुत उकसाने पर बूढ़ा धरमू सुस्त थकी आवाज में बोला, “ये कोई नई बात ना है। गरीब की इज्जत का कोई मतलब ही ना होवे है। ये सब तो होता ही रह। चुप रहणे में ही भला है। पाणी में रहके मगरमच्छ से बैर लेणा ठीक ना है।”

उससे सभी सहमत दिख रहे थे, लोगों में खुसर-पुसर शुरू हो गई थी। धरमू ने गला खंखारकर बात आगे बढ़ाई, “जिनगी बीत गी है, इसी गाँव में। कदी ना सुणा किसी बिरबाणी, बहू-बेटी ने घर आके ज़िक्र भी किया हो। औरत की लाज चुप रहणे में है ढिंढोरा पीटणे में ना है।” धरमू ने जोर देकर कहा।

धरमू की हाँ में हाँ मिलाते हुए रामजीदास भी बोलने लगा, “ये शरीफ बहू-बेट्टियों के लच्छन ना हैं, मर्द के सिर फुटौव्वल कराके ही चैन मिलेगा।”

किसन हैरानी से उन्हें देख रहा था। प्रवीण ने कुछ बोलने की कोशिश की तो वे सभी एक-एक कर खिसकने लगे। किसन का रहा-सहा हौसला भी टूटने लगा। उसने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन धीरे-धीरे सभी उठकर चले गए। एकजुट होकर संघर्ष करने की बात तो दूर, वे बात ही सुनने को तैयार नहीं थे।

तेजभान के डर ने उन्हें इतना भयभीत कर रखा था कि वे कुछ देर रुककर बात सुनने की स्थिति में भी नहीं थे। किसन की मित्र-मंडली के लिए यह स्थिति एकदम नई थी। कॉलेज की राजनीति में उनका दखल था। लेकिन गाँव में कोई भी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

वे चुपचाप एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे। उनके मन में कई तरह के सवाल उठने लगे थे। उनकी लम्बी-लम्बी बहसें खोखली साबित हुई थीं। सभी सोच रहे थे ‘अब क्या करें’।

काफी सोच-विचार के बाद प्रवीण ने सलाह दी, “बिरमा की ओर से पंचायत में शिकायत की जाए।” प्रवीण पंचायती राज का पक्षधर था। वह हमेशा लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता था। उसका कहना था, “पंचायत एक लोकतान्त्रिक संस्था है। गाँव की समस्याओं को निपटाना पंचायत का कर्तव्य है।” सभी उसकी बात से ध्यान से सुन रहे थे।

“पिछले चुनाव में इस पंचायत को आरक्षित किया गया था। बिसन सिंह तुम्हारी बिरादरी का प्रधान है। वह ज़रूर इस मामले को गम्भीरता से लेगा।” प्रवीण ने कहा। प्रवीण की राय से सभी सहमत थे। लेकिन किसन की राय भिन्न थी। उसका कहना था, “बिसन तो एक मोहरा है। वह क्या निर्णय देगा। लेकिन आप लोगों की यही राय है तो ठीक है।”

एक अर्जी तैयार की गई। बिरमा से उस पर अंगूठा लगवाया गया। अर्जी लेकर किसन ही प्रधान के पास गया था। प्रधान ने अर्जी लेने में आनाकानी की। बार-बार यही कहा, “किसलिए अर्जी दे रहे हो?” किसन ने सिर्फ इतना ही कहा, “अर्जी में सब कुछ लिख दिया है।” अर्जी उसके हाथ में थमाकर किसन लौट आया।

अर्जी देखते ही जैसे भूचाल आ गया था। बिसन सिंह प्रधान पसीने-पसीने हो गया था। तेजभान के खिलाफ कोई भी कदम उठाने लायक ताकत उसमें नहीं थी। वैसे ही प्रधानी उसे अभी-अभी मिली थी। बिसन के दिमाग में यह बैठा हुआ था कि उसे प्रधान तेजभान ने ही बनाया है। वरना वह था क्या? उसे डर था कोई बवेला ना हो जाए। बिरमा से ज्यादा उसे अपने लिए खतरा दिखाई दे रहा था। इसीलिए अर्जी देखकर वह बुरी तरह डर गया था। बिना देर किए वह अर्जी लेकर तेजभान की चौपाल पर पहुँचा। जाते ही अर्जी उनके सामने रख दी।

अर्जी देखते ही तेजभान भड़क उठा, “भंगी… चमारों की यह हिम्मत। …क्यूं बे बिसना तुझे प्रधान इसीलिए बणाया था?”

चौधरी साहब! मैं इसीलिए तो खुद चलके आया हूँ। जब से मंगलू ने किसन को कॉलेज पढ़ने भेजा है बस्ती में राजनीति होने लगी है। और चौधरी साहब जमाना भी तो बदल गया है।” बिसन ने दयनीयता से हाथ जोड़कर कहा।

“ओए! बिसना… जमाना अभी भी पहले ही वाला है, तू मुझे सीख दे रहा है। अपणी औकात मत भूल, जमाना तो तब बदलेगा, जिब हम चाहेंगे, जा जाके अपणी प्रधानी संभाल। कहीं वो ही खतरे में न पड़ जावे। होगा वो ही जो हम,चाहेंगे। और इतना उन सभी कू बता देणा, दरोगा से लेकर एस.पी. तक सभी अपणी जात के हैं। एक-एक कू अंदर करा दूंगा। ज्यादा तीन-पाँच करेंगे तो एनकाउंटर में मारे जांगे बिना मौत……” तेजभान ने प्रधान की कमजोर नस पर प्रहार किया कि वह खिसिया कर रह गया। हाथ जोड़कर विनीत स्वर में बोला, “जैसी आपकी मर्जी, मैं तो आपके पक्ष की ही बात कर रिया था।”

“ठीक है। जो करना होगा, हम बता देंगे। मामले को ज्यादा तूल देणे की ज्यादा ज़रूरत ना है। जाके इन्हें समझा। क्यूँ बेमौत मरना चाहते हैं। और हाँ, उन शहरी लफंगों से कह देणा, गाँव में राजनीति ना फैलावें। अंजाम बुरा होगा। सुणा है उन्होंने कोई मीटिंग भी करी थी?” तेजभान ने बिसना की ओर इस तरह देखा जैसे कह रहे है- हमें सब पता है।

बिसना लौट आया। लेकिन घबराया हुआ। तेजभान कभी भी कुछ भी कर सकता है। प्रधान होकर भी उसकी औकात एक मुलाजिम से कम नहीं थी। अपनी ही बस्ती में वह एक बाहरी व्यक्ति जैसे रहता था।

तेजभान ने सचीन्दर को भी डाँटा, “अबे! कुछ करना ही था तो हरामजादी को खेत में ही घसीट लेता… खुद ही किसी को मुँह दिखाणे जोगी नी रहती।”

सचीन्दर मुँह नीचा किए खड़ा रहा। खेत में घसीटने की तो क्या बात, उल्टे बिरमा से पिटकर ही आया। लेकिन इस बात को उसने छिपा लिया था।

गाँव भर में यह खबर आग की तरह फैल गई थी। तेजभान को चमारों से उतना खतरा नहीं था जितना अपने ही कुटुम्बदार चौधरी जगबीर सिंह से था। अगर जगबीर सिंह ने हवा दे दी इस मामले को तो गाँव की रीत ही बदल जाएगी।

उसने मंगलू को चौपाल पर बुलवा भेजा था। “मंगलू तू मुझे अच्छी तरह पिछाणे है। फिर भी ऐसी हरकत की। क्या समझता है- पंचायत हमें फांसी पर चढ़ा देगी! पंचायत है क्या? हमारे पांव की जूती। प्रधान कोई भी रहे नकेल हमारे हाथ में होती है। जा जाके अपनी बेट्टी कू समझा। कुछ ऐसा-वैसा हो गया तो मुझे दोस मत देणा. आगे तेरी मर्जी।” तेजभान की आँखों से आग बरस रही थी।

मंगलू चूपचाप लौट आया। अर्जी के बारे में उसे कोई खबर ही नहीं थी। उसने घर आते ही किसन पर अपना गुस्सा उतारा। तड़तड़ डंडे से पीटना शुरू किया।

“तू, मुझे कहीं का ना छोड़ेगा… पूरे गाँव-देहात में बिरमा की बदनामी कर दी है तूने।”

किसन को देखकर बिरमा दौड़ी। उसने बापू के हाथ से डंडा छीनकर दूर फेंक दिया। आवाज में तीखापन भरकर बोली, “वाह बापू, जो भाई अपनी बहन की आबरू की खातिर लड़ रहा है, तुम उसे पीट रहे हो…. और जो….” अचानक उसके भीतर जमा सैलाब फूट पड़ा। उसका गला रुंध गया। शब्द गले में ही अटक गए थे। सिर्फ रुलाई फुटी पड़ रही थी। आवाज सुनकर माँ भी आ गई थी। वह भी रोने लगी।

बिरमा को रोता देखकर मंगलू भी रोने लगा। उसने फफकते हुए कहा, “तू ही बता बेट्टी मैं क्या करूं… वे सब जालिम लोग हैं…”

“कुछ मत करो बापू! जुल्म के आगे झुक जाने पर भी क्या होगा…” बिरमा ने मंगलू को ढाढ़स दिया।

किसन चुपचाप एक ओर खड़ा था। उन्हें देखकर वह अपनी पीड़ा भूल गया था। उनके करीब आकर बोला, “बापू! हमारे पास न ताकत है, न रुतबा… लेकिन अपनी जान देकर आत्मसम्मान तो माँग ही सकते हैं…”

बिरमा को लगा जैसे वह अचानक बड़ी हो गई है। वह सिर्फ अपने लिए ही नहीं सबके लिए लड़ सकती है।

किसन ने मंगलू से कहा, “बापू ! पंचायत से इन्साफ और सुरक्षा माँगी है… कोई गुनाह तो नहीं किया।”

जैसे-जैसे किसन और बिरमा का स्वाभिमान जाग रहा था अपनी ही बस्ती में अलग-थलग पड़ रहे थे। आखिर पंचायत के फैसले का दिन आ ही गया था। कार्यवाही ज्यादा लम्बी नहीं थी। न किसी का बयान लिया गया था, न किसी किस्म की कोई चर्चा ही हुई थी। न बहस। न आरोपी को बुलाया गया न फरियादी को। बस, सिर्फ फैसला था। ‘सचीन्दर वल्द तेजभान ने बिरमा वल्द मंगलू के साथ राह चलते छेड़खानी करने की कोशिश की। भविष्य में ऐसी घटना न हो, इसलिए पंचायत सचीन्दर पर पाँच रुपया जुर्माना करती है।’

इस फैसले से किसन और मंगलू अवाक् रह गए थे। किसन ने विरोध किया। लेकिन उसे बोलने से रोका गया। पंचों का फैसला परमेश्वर का फैसला कहकर बात खत्म करने की कोशिश की गई।

किसन लगातार बोलने की कोशिश करता रहा। लेकिन कुछ लोगों ने उसे धकिया कर बाहर निकाल दिया। तेजभान के लोग उठकर खड़े हो गए थे। लाठियाँ फिर से लम्बी होने लगी थीं।

किसन हताश होकर लौटा था। पीछे-पीछे मंगलू भी आ गया था। बिरमा ने उनके उतरे चेहरे देखे तो सब कुछ समझ गई। घर में मातम-सा छा गया था।

शाम तक किसन की मित्र-मंडली भी आ गई थी। पंचायत का फैसला सुनकर उनके चेहरे भी उतर गए थे।

किसन ने उदास आँखों से प्रवीण की ओर देखा- “कहो कैसा है पंचायती राज?” आँखों में सवाल था। प्रवीण जैसे अपने ही भीतर कुछ खंगाल रहा था। उन्हें चुप देखकर बिरमा बोली, “किसन भैया ठीक कहवे थे पंचायत में नियाय ना होता, जात-बिरादरी देखी जावे है। गुंडागर्दी होती है पंचायत के नाम पे…” बिरमा को इस तरह बोलते हुए वे पहली बार देख रहे थे। बिरमा की मुखरता से चेहरे पर एक अजीब-सी चमक आ गई थी। जिसकी ओर सभी का ध्यान गया था।

प्रवीण जो अभी तक चुप ही था। उसने बिरमा से कहा, “हाँ, तुम ठीक कह रही हो, किसन ने पहले ही कहा था। बिसन सिंह एक प्रधान होते हुए भी सिर्फ मोहरा है।” बिरमा ने उन सभी को संबोधित करते हुए कहा, “इस हार पर मुँह क्यों लटका रे हो। ये अंत ना है…. तुम लोगों ने मेरे विश्वास कू जगाया है… इसे मारने मत देणा।” उसके भीतर जैसे कुछ उबल रहा था, जो बाहर आना चाहता था।

सभी ने मिलकर कहा था, “ना बिरमा… यह अंत नहीं है… तुमने हमें ताकत दी है। हार को जीत में बदलेंगे, लोगों में विश्वास जगाकर, ताकि फिर कोई बिसन मोहरा ना बने।”

सभी के चेहरों पर उम्मीद दिखाई दे रही थी। मंगलू और सरबती भी उनके साथ आकर मिल गए थे, एक नई उम्मीद के साथ।