यह तुम पर लिखी अंतिम कविता है
यह तुम्हारा अंतिम परिचय है

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तुम एक गीत हो
अपशकुन लाने वाला गीत

ऐसी मान्यता है ~
तुम्हें गाने वालों पर होता है
अपनों ही द्वारा कुठाराघात ।

परन्तु, तुम चढ़ गई हो
मेरी ज़ुबान पर
और सारे ख़ानदान के
बार-बार रोकने के बावजूद
मैं तुम्हें गुनगुनाता फिर रहा हूँ

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तुम सृजन की देवी हो
जब तुम या तुम्हारी कोई याद
होती है मेरे पास
मिटने लगता है
मेरा अहंकार, क्रोध, घृणा
ग्लानि और ज्ञान
हो जाता हूँ थोड़ा कम हिंसक
थमने लगता है प्रतिरोध

निर्मित होता है
ऐसा वातावरण
जिसमें बेपरवा हो
थिरकते हैं पाँव,
गुनगुनाते हैं होंठ,
उंगलियाँ छेड़ती हैं
सितार पर कोई नई धुन,
जिह्वा माँगती है नया स्वाद
बनता है कोई नया व्यंजन
और फलने लगता है सृजन

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तुम पुजारन हो
तुम्हारे अस्त-व्यस्त कमरे में हैं
सारे देवी-देवता
शिव-पार्वती, मनमोहन कृष्ण, राधा रानी
और भी ना जाने कौन-कौन ?

पर, मैं नहीं हूँ
मेरा होना सम्भव भी नहीं है
मेरे होने का अर्थ है ~
प्रश्नों की एक श्रृंखला,
कई ताम-झाम, नोंकझोंक,
छुपन-छुपाई

तुम्हारी देवों के प्रति इस आस्था ने
मुझे देवों के प्रति ईर्ष्यालु बनाया है

अब, बस एक इच्छा है
मुझे ब्रह्म होना है..