युद्ध के मैदान से परे

युद्ध में केवल सैनिक ही नहीं मरते
युद्ध मारक होता है कई अर्थों में

युद्ध के मैदान से परे
युद्ध मार करता है आत्मा के अंतिम छोर तक

कई परतों में पायी जाती हैं लाशें मैदान के अलावा भी

जिनमें मरा हुआ मिलता है शिशु माँ की लाश के सूखे स्तनों में दूध तलाशता
और एक कोख का शव भी
जो अपने अजन्मे जीवन के साथ ही फ़ना हो गई।

जिनमें मर जाता है वह पेड़ भी जो जीवन झुलाता था
और लहुलुहान आंगन भी
जिसमें लहू की सूखी पपड़ी से झांकती बिलौरी आंखें और
कंचे खेलने निकले कोमल हाथ
जो साथी मिलने से पहले ही उड़ गए थे कन्धों से।

वहीं दिख जाते हैं
राख के रंग में छिपे हुए दाढ़ी के सफेद बाल उस बूढ़े बाबा के
जो निकला था बिखरी बटियां
बटोरने बीमार नातिन के लिए।

वहीं पर पायी जाती है गूंगे
दरवाजे तले दबी मृत युवती
प्रेम किया था जिसने हम उम्र से
उसकी रक्त सनी उंगलियाँ ऐसी लगें मानो लिख रही थीं प्रेमी का नाम।

वहाँ मिल जाता है एक
मरा हुआ मकान भी
जहां खून सने चीथड़ों में लिपटी किताब और विक्षिप्त कवि के हाथ से छूटी कलम और दम तोड़ चुकी टूटी ऐनक भी मिल जाती है।

उन्ही परतों में मिल जाती है एक मुर्दा गली भी
जहां बिखरे पड़े जर्द पत्ते
और जहाँ नहीं चलती कोई ज़िन्दा हवा।

वहीं मिलता है मलबा जीवन का और मलबे में पड़ा एक कैनवास
जिस पर बना अधूरा चित्र एक बच्ची का
जिसके हाथ से उड़ता शांति दूत
बनाते मलबे में ही दफन हुआ
चित्रकार भी दिख जाता है।

कैमरे में कैद स्कूल के खण्डहर और भग्नावशेष हुए हस्पताल भी मिल जाते हैं पत्रकार के हाथों में।

बस जिंदा रहते हैं जनसंहार के आंकड़े और घृणा में डूबा अहम
जो तैयार करते हैं
सत्ता की उपजाऊ जमीन
और बताते हैं काला इतिहास।