उड़िया कविता: ‘युद्ध’ – शत्रुघ्न पाण्डव

कुरुक्षेत्र से कुवैत तक
धृतराष्ट्रों की आँखें फूट चुकी थीं
रक्त में जल रहा था अहंकार
घायल किए बिना नहीं लौटता
कोई भी अस्त्र
एक-एक अजातशत्रु आपस में जूझ रहे थे
कोई नहीं लौटता रणभूमि से।

अस्त्र भूल चुके थे मन्त्र
रक्त भूल चुका था रिश्ते-नाते
रणभूमि भूल चुकी थी पक्ष।

अथाह रक्त-नदी-तट पर
कोई नहीं था।

भूमि पर होने वाले परीक्षणों के लिए
मौजूद था अश्वत्थामा का नाराच।

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चित्र श्रेय: Paul Bulai