कविता

घटना नहीं है घर लौटना

रोहित ठाकुर : तीन कविताएँ घर लौटते हुए किसी अनहोनी का शिकार न हो जाऊँ दिल्ली - बम्बई - पूना - कलकत्ता न जाने कहाँ-कहाँ से पैदल चलते...

कहानी

फ़लक तक चल… साथ मेरे

पर्दों के बीच की झिरी से सूरज की किरणें वनिता के चेहरे पर ऐसे पड़ रही थीं जैसे किसी मंच पर प्रमुख किरदार के...

स्त्री लेखन

पर्दों के बीच की झिरी से सूरज की किरणें वनिता के चेहरे पर ऐसे पड़ रही थीं जैसे किसी मंच पर प्रमुख किरदार के चेहरे पर स्पॉटलाइट डालकर उसके चेहरे के भावों को उभारा जाए। रूखे-बिखरे काले बालों में...
क्या तुमने उसकी कमर टटोलने से पहले क्या तुमने टटोली हैं उसकी हथेलियाँ? उसके अधर चूमने से पहले क्या तुमने चूमा है उसका माथा? क्या तुमने कभी उसके सीने को स्पर्श किए बिना स्पर्श किया है उसका हृदय? प्रेम एवं विवाह प्रेम एक अप्रत्याशित घटना है नीति रहित इसके ठीक उलट विवाह एक सोची-समझी योजना हैै कूटनीति से भरी हुई। चरित्रहीन तुमने उसे प्रेम...
दरवाज़े के पीछे परदे की ओट से झाँकती औरत दरवाज़े से बाहर देखती है- गली-मोहल्ला, शहर, संसार! आँख, कान, विचार स्वतन्त्र हैं बन्धन हैं सिर्फ़ पाँव में कुल की लाज सीमाओं का दायरा घर की चौखट तक मायका हो या ससुराल दरवाज़े के पीछे परदे की ओट से वह देखती है संसार समझने...
मैट्रिक के इम्तिहान के बाद सीखी थी दुल्हन ने फुलकारी! दहेज की चादरों पर माँ ने कढ़वाए थे तरह-तरह के बेल-बूटे, तकिए के खोलों पर 'गुडलक' कढ़वाया था! कौन माँ नहीं जानती, जी, ज़रूरत दुनिया में 'गुडलक' की! और उसके बाद? एक था राजा, एक थी रानी और एक थी...
उन लड़कियों ने जाना पिता को एक अडिग आदेश-सा, एक मुहर-भर रहे पिता बेटियों के दस्तावेज़ों पर। कहाँ जाना, क्या खाना, क्या पढ़ना, निर्धारित कर, पिता ने निभायीं ज़िम्मेदारियाँ अपनी, बहरे रहे पिता अपनी परियों की खिलखिलाहट से गूँगी हो गयीं बेटियाँ, माँ पर उठे हाथ के एवज़ में। चुन-चुनकर...

दलित साहित्य

ग़ज़ल

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