कविता

परदे के पीछे

परदे के पीछे मत जाना मेरे भाई टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे, बैठे हुए कसाई। बड़े-बड़े अफ़सर बैठे हैं माल धरे तस्कर बैठे हैं बैठे हैं कुबेर के बेटे ऐश लूटते...

कहानी

गणित

दादी सास को गुज़रे महीने-भर से ऊपर हो गया था... वो‌ बात अलग थी कि लॉकडाउन में फँसे होने के कारण इतने दिनों बाद...

स्त्री विमर्श

इज़्ज़त की बहुत-सी क़िस्में हैं घूँघट, थप्पड़, गन्दुम इज़्ज़त के ताबूत में क़ैद की मेख़ें ठोंकी गई हैं घर से लेकर फ़ुटपाथ तक हमारा नहीं इज़्ज़त हमारे गुज़ारे की बात है इज़्ज़त के नेज़े से हमें दाग़ा जाता है इज़्ज़त की कनी हमारी ज़बान से...
कोई तो होगी जगह स्त्री के लिए जहाँ न हो वह माँ, बहिन, पत्नी और प्रेयसी न हो जहाँ संकीर्तन उसकी देह और उसके सौन्दर्य के पक्ष में जहाँ न वह नपे फ़ीतों से न बने जुए की वस्तु न हो आग का दरिया या अग्निपरीक्षा न हो लवकुश अयोध्या, हस्तिनापुर, राजधानियाँ और फ़्लोर शो और...
खिड़कियाँ खोल दो शीशे के रंग भी मिटा दो परदे हटा दो हवा आने दो धूप भर जाने दो दरवाज़ा खुल जाने दो मैं आज़ाद हुई हूँ सूरज आ गया है मेरे कमरे में अन्धेरा मेरे पलंग के नीचे छिपते-छिपते पकड़ा गया है धक्के लगाकर बाहर कर दिया गया है उसे धूप से तार-तार...
प्यार के क्षणों में कभी-कभी ईश्वर की तरह लगता है मर्द औरत को ईश्वर... ईश्वर... की पुकार से दहकने लगता है उसका समूचा वजूद अचानक कहता है मर्द— "देखो मैं ईश्वर हूँ" औरत देखती है उसे और ईश्वर को खो देने की पीड़ा से बिलबिलाकर फेर लेती है अपना मुँह। Book by Jyotsna Milan:
उत्तराधिकार के नाम पर मिलीं कुछ चिट्ठियाँ जिनका जवाब देना है, कुछ उधार जो चुकता करना है, टूटे लोहे के बक्से, घिसे बरतन, कुछ गूदड़ जिन्हें देख-देखकर अपने पर स्वयं दया दर्शाने से कुछ सिद्ध नहीं होता। जिन्हें छोड़ा भी नहीं जा सकता और न रखने...

दलित विमर्श

ग़ज़ल

उद्धरण

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