कविता

कहानी

स्त्री विमर्श

यह स्त्री सोयी नहीं है

बहुत अर्से से यह स्त्री सोयी नहीं है उसकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे इसका प्रमाण हैं समस्त सृष्टि को अपने आग़ोश में लेकर उसे विश्राम दिलाने का दावा करती रात्रि का...

मैं कभी पीछे नहीं लौटूँगी

मैं वह औरत हूँ जो जाग उठी है अपने भस्‍म कर दिए गए बच्‍चों की राख से मैं उठ खड़ी हुई हूँ और बन गयी हूँ एक...

खोज की बुनियाद

यह रहस्य तो नहीं खोज की बुनियाद है आज फिर मैं उड़ने लगी हूँ बे-पर बंजर ज़मीन पर फूटे हैं अंकुर आस की दूब चरने लगा है मन का मिरग किस दिशा से बांधोगे तुम इसे काल का...

दलित विमर्श

खोज की बुनियाद

यह रहस्य तो नहीं खोज की बुनियाद है आज फिर मैं उड़ने लगी हूँ बे-पर बंजर ज़मीन पर फूटे हैं अंकुर आस की दूब चरने लगा है मन का मिरग किस दिशा से बांधोगे तुम इसे काल का...

इतिहास

वक़्त की रेशमी रस्सी मेरे हाथ से फिसल रही थी इतिहास का घोड़ा उसे विपरीत दिशा में खींच रहा था तुम्हें यह कितना बड़ा मज़ाक़ लगता था जब मैं उसे अपनी तरफ़ खींचता था रस्सी...

क्या-क्या मारोगे?

उम्मीदों सपनों पत्थरों लोगों फूलों तितलियों तारों को मारोगे? मरीज़ों दवाओं स्त्रियों दलितों मछलियों झीलों समुन्दरों को मारोगे? हिरणों मेमनों मौसमों जंगलों पर्वतों नदियों पुलों को मारोगे? पलों दिनों हफ़्तों महीनों सालों युगों सदियों को मारोगे? शब्दों अक्षरों वर्णों स्वरों शैलियों भाषाओं व्याकरणों को मारोगे? रातों साँसों चुम्बनों उमंगों ख़्वाबों भावनाओं विचारों कविताओं को मारोगे? बच्चों रोटियों घरों माँओं बहिनों भाइयों साथियों को मारोगे? किताबों कार्यों कोंपलों कोमलताओं कौमार्य कमेरों क्रान्ति को मारोगे? समय समता सरोकार सवालों सन्ध्या सुबह साहित्य को मारोगे? जन्म जंगल ज़ुबान जीभ ज़मीन जनता जनतन्त्र को मारोगे? आज आज़ादी अधिकार अदब आदमी आन्दोलन आम्बेडकरों को मारोगे? मन्तव्यों मक़सदों मतलबों मनुष्यों मुद्दों मसलों मंज़िलों को...

लेख

पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के साथी

'ई. वी. रामासामी पेरियार : दर्शन-चिंतन और सच्ची रामायण' से विवाहित दम्पतियों को एक-दूसरे के साथ मैत्री-भाव से व्यवहार करना चाहिए। किसी भी मामले में...

जनता का साहित्य किसे कहते हैं?

ज़िन्दगी के दौरान जो तजुर्बे हासिल होते हैं, उनसे नसीहतें लेने का सबक़ तो हमारे यहाँ सैकड़ों बार पढ़ाया गया है। होशियार और बेवक़ूफ़...

सुन्दरता और त्वचा का रंग

"सौंदर्यशास्त्र राजनीति से प्रभावित होता है; शक्ति सुंदर दिखाई देती है विशेषकर गैरबराबर शक्ति।"

मिट्टी के साथ बदल जाते हैं, सौन्दर्य के मानक

शांत साधक जैसे नयनों में खिंची काजल की एक महीन लकीर, माथे पर खिलखिलाती बड़ी-सी टिकुली, लज्जा से आरक्त मुख और सद्यःस्नाता देह की...

कहानी क्यों लिखता हूँ?

'साहित्य और संस्कृति' से क्यों?... इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। जीवन में हम कोई भी काम क्यों करते हैं? हँसते क्यों हैं? रोते...

ग़ालिब

सुमित्रानन्दन पन्त का लेख 'ग़ालिब' | 'Ghalib', an article by Sumitranandan Pant   कोई भी महान साहित्यकार या कवि किसी विशेष भाषा या किसी विशेष देश-काल...

साम्प्रदायिकता और संस्कृति

प्रेमचंद का लेख 'साम्प्रदायिकता और संस्कृति' | 'Sampradayikta Aur Sanskriti', an article by Premchand साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली...

हम ग़द्दार

अमृता प्रीतम की सम्पादकीय डायरी से मैं नहीं जानती—दुनिया में पहली कौन-सी राजनीतिक पार्टी थी, और समय का क्या दबाव था कि उसे लोगों की...

नारी तुम केवल श्रद्धा हो

'आदमी की निगाह में औरत' से दलितों के साथ स्त्रियों की दुर्दशा भी गाँधीजी का बहुत बड़ा सरोकार रही है। वह उनके सामाजिक सर्वोदय का...

उद्धरण

32,144FansLike
10,637FollowersFollow
20,684FollowersFollow
620SubscribersSubscribe
कॉपी नहीं, शेयर करें! ;-)