5, ख़ुसरोबाग़ रोड
इलाहाबाद, 21-11-61

प्रिय राजकमल,

तुम्हारा पत्र मिला। उपन्यास (नदी बहती है) की प्रतियाँ भी मिलीं। मैं उपन्यास पढ़ भी गया। रात ही मैंने उसे ख़त्म किया और बहुत देर तक नींद नहीं आयी। तुमने बहुत से प्रश्न उठाए हैं, जो अनास्था के क्षणों में आज ही नहीं, पहले भी ऐसी घड़ियों में इंसानों के दिलों में उठे हैं। आदमी स्वार्थी है, कामी है, कमीना है, अर्थ से बंधा है, समझौते करता है, टूटता है, बिकता है, मरता है… लेकिन इन प्रश्नों के उत्तर में दसियों प्रश्न मेरे दिमाग़ में उभरते रहे और पत्र के माध्यम से वे सब प्रश्न क्या लिखूँ, कभी फ़ुर्सत से मिलोगे तो हम बात करेंगे। तुम्हारी बात को मानकर चलूँ तो अपने जीवन को किसी तरह explain नहीं कर सकता, जबकि सुख-सुविधा और सिक्योरिटी को छोड़, अच्छी नौकरियों से पल्ला छुड़ा, रेडियो और सिनेमा की दुनिया से सम्बन्ध तोड़, कमर तोड़ने वाले संघर्ष में लगा रहा हूँ। निराला के जीवन को कैसे एक्सप्लेन करूँ? फिर तुम ही मसूरी की सुख-सुविधा को छोड़, कलकत्ते में क्यों भटक रहे हो? आदमी स्वार्थी, कामी, यश और धन का लोलुप, पग-पग पर अर्थ और सत्ता से समझौते करने वाला, कायर और डरपोक है—पर क्या आदमी सिर्फ़ इतना ही है? क्या वह मात्र पशु है? यदि तुम्हारी यह मान्यता ही एकमात्र सत्य है तो मैं ज़िन्दगी की हज़ारों दूसरी घटनाओं को एक्सप्लेन नहीं कर सकता। दसियों घटनाएँ दिमाग़ में आती हैं, जब नितांत अपरिचित एकदम स्वार्थ-रहित होकर सहायता देते हैं, नितांत अपरिचित नुक़सान सहकर दूसरों को लाभ पहुँचाते हैं… बीसियों घटनाएँ मेरे दिमाग़ में आती हैं।

फिर तुमने साम्यवादियों को अत्यंत बुरे रंग में चित्रित किया है, ऐसे लोगों को मैं भी जानता हूँ, पर मैं ऐसे साम्यवादी को भी जानता हूँ जो गत बीस वर्षों से सब सुख-सुविधा अपने ऊपर हराम किए हुए तिल-तिल अपनी सेहत गँवा रहा है और शत्रु भी जिसकी प्रशंसा करते हैं।…

और बीसियों बातें तुम्हारे उपन्यास को पढ़कर मन में आती रहीं।

उस समय भी जब इंसान अपने ही हाथों अपना ख़ात्मा करने के किनारे खड़ा है, उसके इस रूप को देखकर दूसरे (वह चाहे उसका पाँच प्रतिशत अंश भी क्यों न हो) रूप के बारे में आस्था बंधती है।

हो सकता है कि मैं जन्म से ही आशावादी हूँ और तुम कलकत्ता की भूल-भुलैयाँ में अपनी आस्था खो रहे हो। यदि जीवन यही कुछ है तो तुम क्यों मसूरी की सुख-सुविधा तजकर चले आए हो? यह प्रश्न बार-बार मेरे मन में आता रहा।

बहरहाल, कभी मिलोगे तो मैं तुमसे बातें करूँगा। तुम्हारे पास बड़ा ही ओजपूर्ण, प्रवाहमान स्टाइल है, लेकिन डर लगता है कि इस सब के बावजूद तुम महज भटककर न रह जाओ।

तुमने जाने किसकी उक्ति दोहरा दी है कि महान कला नितांत निरुद्देश्य होती है। मेरा इसमें विश्वास नहीं है। किसी ऐसी पुस्तक का नाम बताओ, जिसे दुनिया ने महान माना हो और जो नितांत निरुद्देश्य हो।

फिर एक प्रश्न मेरे दिमाग़ में यह भी आया कि तुमने इस पुस्तक को ‘गर्मराख के लेखक’ के नाम क्यों डेडिकेट किया। क्या ‘गर्म राख’ में तुम्हें अनास्था ही अनास्था मिली है? या चुनौती के रूप में तुमने इसे पेश किया है?

जहाँ तक उपन्यास के पात्रों, उनके चरित्र-चित्रण और दूसरी बातों का सम्बन्ध है, कभी जब तुम मेरे सामने बैठे होंगे तभी मैं बातें करूँगा, जब मैं रू-ब-रू तुम्हारी बात भी सुन सकूँ और अपनी भी कह सकूँ। जाने तुम किन लेखकों को पसंद करते हो, जाने तुम्हारी प्रेरणा के स्रोत कौन से हैं? तुम्हारे बारे में मैं नहीं कह सकता, अपने बारे में कह सकता हूँ—मुझे यदि जीवन में इतनी अनास्था हो तो मैं एक पंक्ति भी न लिखूँ और आत्महत्या कर लूँ। पर ज़िन्दगी के विराट रूप को देखता हूँ तो इस सबके साथ बहुत कुछ ऐसा भी दिखायी देता है जो सारी कटुता सोख लेता है और ज़िन्दगी में उपादेय ढंग पर जीने की प्रेरणा देता है। अब उस पक्ष का कितना कुछ साहित्य में आ पाता है, यह कहना मुश्किल है, पर उसका कुछ अंश भी आ पाए तो समझता हूँ कि प्रयास विफल नहीं, उसी को बचाए रखने के लिए तो शेष सबका पर्दाफ़ाश करने की ज़रूरत है।

मैं generalizations में भटक गया, पर तुमने अपने उपन्यास में बड़े general remarks दिए हैं।

तुम्हारी शैली का मैं क़ायल हूँ, यही डर है कि इतनी अतुल प्रतिभा ग़लत जगह लगाकर तुम अंत में कुंठित न हो जाओ। मैंने इसी जीवन में ग़लत जीवनदृष्टि के कारण प्रतिभाशालियों को कुंठित होकर ख़त्म होते देखा है।

कुछ बातें मुझे खटकी हैं। एक जगह तुमने शब्द ‘वहशीयत’ लिखा है, जबकि वहशत होना चाहिए था, ‘ब्रोकेन’ या ‘ब्रोकन’ की जगह बार-बार ‘ब्रोक्न’ लिखा है; ‘ब्लाउज़’ स्त्रीलिंग में लिखा है; ‘गरज’ को बार-बार ‘गरज़’ लिखा है और चूँकि ऐसे प्रयोग कम हैं और ग़लत हैं, इसलिए वे इतनी सुंदर शैली में मक्खन में पत्थर के रेज़ों की तरह खटकते हैं।

मैं रचनाएँ बड़े ध्यान से पढ़ता हूँ। जब भी कभी मिलोगे, विस्तार से बातें करेंगे। मुझे न कथानक भूलेगा, न पात्र, न वह जो अच्छा लगा, न वह जो बुरा। ‘निराला’ के बारे में एक अपूर्ण संस्मरण मैं तुम्हें भिजवा रहा हूँ। एक मित्र के अनुरोध पर स्थानीय दैनिक के लिए लिखा था, पर बीमारी के कारण पूरा नहीं कर सका। अभी एक मित्र का अनुरोध आया था कि उसी तरह भेज दूँ, पर तुम्हें भेज रहा हूँ। अपूर्ण है, पर अपने में पूर्ण है। शीर्षक कोई अच्छा-सा दे देना। निराला के मनोविज्ञान के कुछ नुक्ते मैंने इसमें देने का प्रयास किया है। यदि तुम्हें यह पसंद न आए, इसे न छापना चाहो, या तुम्हारे संकलन की स्कीम सिरे न चढ़े तो इसे लौटा देना। ‘राग-रंग’ वाली बात न दोहराना।

सस्नेह
उपेन्द्रनाथ अश्क

Book by Upendranath Ashk:

Previous articleचिड़ियों को पता नहीं
Next articleपानी
उपेन्द्रनाथ अश्क
(14 दिसम्बर 1910 - 19 जनवरी 1996)हिन्दी एवं उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासार व नाटककार।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here