जागरण कार्यालय, 1 सितम्बर, 1933

प्रिय जैनेन्द्र,

तुम्हारा पत्र मिला। हाँ भाई, तुम्हारी कहानी बहुत देर में पहुँची। अब सितम्बर में तुम्हारी और ‘अज्ञेय’ जी की, दोनों ही जा रही हैं। जुलाई में ‘क्रान्तिकारी की माँ’ नाम की कहानी ‘हंस’ में छपी थी, उस पर सरकार ने ज़मानत की धमकी दी।

आजकल इतनी मंदी है कि समझ में नहीं आता काम कैसे चलेगा। मज़दूरों को वेतन चुकाने में कठिनाई पड़ रही है। इसलिए तुम्हारे पास कुछ न भेज सका। जिनके ज़िम्मे बाक़ी है, वह साँस ही नहीं लेते। रुपये मिलते ही महावीर के ख़र्च के लिए भी रुपये भेजूँगा और तुम उन्हें ताकीद कर देना कि मेरठ और दो-तीन शहरों का दौरा करते और एजेंटों से बातचीत करते हुए आवें। यहाँ आने पर मैं उन्हें बिहार की ओर भेजूँगा। ‘मेग्डेलीन’ तुम्हारे आदेशानुसार कार्यालय में पहले ही लगाए देता हूँ।

मेरा जी इतने छोटे से काम में हार नहीं मानना चाहता। ‘जागरण’ अब तक नफ़ा देता यदि मैं ‘हंस’ और सुन्दर निकाल सकता, इसकी सामग्री और सुन्दर बना सकता, इसमें दो-चार चित्र दे सकता। लेकिन धन का काम अब समय से लेना पड़ेगा। मैं चाहता हूँ कि तुम यह समझो कि तुम्हीं यह पत्र निकाल रहे हो और इसके नुक़सान में नहीं, नफ़े में भी उतने ही शरीक हो जितना मैं। मैं तो चाहता हूँ कि यहाँ कार्यालय इतना सम्पन्न हो जाए कि हमें किसी प्रकाशक का मुँह न देखना पड़े। हम दोनों मिलकर इसे सफल न बना सके तो खेद की बात होगी। ‘स्टेट्समैन’, ‘नेशनल काल’ और कितने ही अंग्रेज़ी पत्र वहाँ मिल सकते हैं, उनमें से Informative सामग्री दी जा सकती है। दो चार नोट लिखना मुश्किल नहीं। हाँ, इच्छा होनी चाहिए। मैटर अच्छा होने पर इस पर जनता की निगाह जमेगी। मैं एक पृष्ठ चित्रों के देने की फ़िक्र में भी हूँ।

पुस्तकें लगातार लिखते रहना अपने बस की बात नहीं है। कभी-कभी महीनों काम नहीं होता और न पुस्तकों से इतने रुपये मिल सकते हैं कि उन पर depend किया जा सके।

यह भी तो चिन्ता रहती है कि कोई ऊटपटाँग चीज़ न लिख दी जाए। समाचारपत्र तो दुकान है। एक बार चल निकले तो उससे थोड़े परिश्रम में आमदनी हो सकती है, और तब पुस्तक भी लिखा जा सकती है। यह (ठीक बात) है कि मेरी उम्र एक नये व्यवसाय में पड़ने की नहीं है, लेकिन मैं उम्र को और स्वास्थ्य को बाधक नहीं बनाना चाहता। तुम कम से कम दो कॉलम का एक लेख अवश्य दे दिया करो। किसी मामले पर टिप्पणियाँ करना चाहो तो वह भी बैरंग बृहस्पत तक मुझे दे दो।

समाचारपत्रों की आमदनी का दारोमदार विज्ञापनों पर है। मैंने बिड़ला से मिलने को कहा था। अपनी ग़रज़ से मत मिलो, मेरी ग़रज़ से मिलो, पत्र दिखाओ, उसकी चर्चा हो। और उनसे ख़ैरात तो कुछ माँगते नहीं। विज्ञापन दिला देने का अनरोध करो। यह कह सकते हो कि इस पत्र को घाटा हो रहा है, और थोड़े से सहारे से यह बहुत उपयोगी हो सकता है। उनके पास कई मिलें हैं, एकाध पृष्ठ का विज्ञापन उनके लिए तो कुछ नहीं है, लेकिन मेरे और तुम्हारे लिए वह बावन रुपये महीना का सहारा है।

भाई, यह संसार चुपके से राम-भरोसे बैठने वालों के लिए नहीं है। यहाँ तो अंत समय तक (खटना) और लड़ना है। उनसे कुछ मदद पा सकते हो। यहाँ झेंपू और मेरे जैसे शर्मीले आदमियों का गुज़ारा नहीं। उनके लिए तो कोई स्थान ही नहीं। तुम अपने में यह ऐब न आने दो। है भी नहीं। मैं तो कौड़ी दाम का नहीं हूँ। अख़बार निकालना मेरी (हठधर्मी) है। कुछ (ज़िद्दी) हूँ और हार नहीं (मानना) चाहता। खेती करता तो उसमें भी इसी तरह चिमटता।

यहाँ वर्षा कम हुई। घर के और सब लोग मज़े में हैं। दिलीप तो अच्छा है। भगवती से मेरा आशीर्वाद कहना।

भवदीय, धनपत राय।

जैनेन्द्र का संस्मरण 'एक शांत नास्तिक संत: प्रेमचंद'

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प्रेमचंद
प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव, प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी।

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