Image Credit: Douluri Narayana

प्रिय सत्यरूप जोतीबा जी को
सावित्री का प्रणाम,

आपको पत्र लिखने की वजह यह है कि मुझे कई दिनों से बुख़ार हो रहा था, इस कारण मेरी तबीयत बहुत ख़राब थी। कभी बुख़ार उतर जाता और कभी तेज़ हो जाता लेकिन अब बुख़ार नियंत्रण में है। मेरी इस अवस्था में मेरे भाई ने मेरी ख़ूब सेवा की और निरंतर देखभाल की, उसकी इस सेवा से मैंने महसूस किया कि मेरे प्रति उसका प्यार और लगाव बहुत ही ज़्यादा है।

मेरी चिंता न करें, मैं पूरी तरह स्वस्थ होकर ही आऊँगी। मैं जानती हूँ कि मेरे पुणे में न होने के कारण फ़ातिमा शेख़ पर काम का बोझ बढ़ गया होगा। उसे बस काम सम्भालने में काफ़ी तकलीफ़ हो रही होगी, परन्तु फ़ातिमा शेख़ काम करने में कभी ना-नुकर नहीं करती, इस बात की मुझे ख़ुशी है और विश्वास है कि वो काम ठीक से सम्भाल लेगी।

मायके में रहते हुए अक्सर भाई से आपके कामों के बारे में चर्चा होती रहती है, एक दिन उसने कहा कि, “तुझे और तुम्हारे पति जोतीबा जी को समाज से बहिष्कृत कर दिया है और इससे पता चलता है क्योंकि आप दोनों महार-मांग जैसे अस्पृश्यों के लिए काम करते हो, आपका ये कार्य पापकार्य है। यह निकृष्ट काम करके तुम लोग कुल को डुबोने का काम कर रहे हो, तुम लोग पथभ्रष्ट हो गये हो। मैं तुम्हें और तुम्हारे पति जोतीबा को फिर से समझा रहा हूँ कि अपनी जात-बिरादरी की परम्परा निभाते हुए, उनके बताए रास्ते पर चलना चाहिए। वो जैसा होते हैं हमें भी वैसा व्यवहार करना चाहिए। ये भी याद रहे कि ब्राह्मण जो बात बताए और जो कहे वही बात हमें धर्म सम्मत मानकर उनका अनुसरण करना चाहिए।”

भाई की वे सब असंगत बचकानी अतार्किक बातें सुनकर माँ को अच्छा नहीं लगा और उनका चेहरा उतर गया। वैसे तो मेरा भाई स्वभाव से दयालु प्रवृत्ति का है लेकिन वह बहुत भावुक और नासमझ भी है। बिरादरी वालों की बातें सुन-सुन और उनकी बातों में आकर उसने न केवल मुझे भला-बुरा कहा बल्कि आपकी भी बुराई की। हम दोनों पर दोषारोपण किया। हम दोनों की निंदा करने में उसे कोई झिझक नहीं हुई। माँ ने ये सब सहन किया हालाँकि उन्हें भाई का बर्ताव और व्यवहार अच्छा नहीं लगा। माँ ने मेरे भाई के साथ कोई डाँट-फटकार नहीं की, न ही खरी-खोटी सुनायी। माँ ने बड़े शांत लहजे में भाई से कहा कि तुझे ईश्वर ने सुंदर काया दी है, तू इसका दुरुपयोग क्यों किए जा रहा है? यह बिलकुल ठीक नहीं है, समझे।

माँ के इस तरह शांत पर उलाहने भरी बात सुनकर भाई चुप हो गया, उसका शर्म से सर झुक गया, हमारे सामने ही वो निर्विकार मुद्रा में बैठे रहा। हम सबके बीच सन्नाटा पसर गया। इस सन्नाटे को तोड़ते हुए मैंने अपने भाई से निम्रता और गम्भीरतापूर्वक उसकी ओर देखते हुए उससे पूछा कि तुम्हें क्यों लगता है कि जो तुमने कहा वो परम सत्य है? भाई, तुम्हारी बुद्धि को क्या हुआ है? आपको क्यों नहीं समझ आता कि आप बिलकुल नासमझ व्यक्ति की तरह बात करते हो। आपकी मति ब्राह्मणों की चाल की शिकार हो गयी है। उनकी घुट्टी पी-पीकर, उनके पाखण्डी उपदेश सुनकर आपकी बुद्धि दुर्बल हो गयी है और इसी कारण आपके स्वयं के विवेक ने काम करना बंद कर दिया है। एक तरफ़ आप इतने दयालु बनते हैं कि बकरी गाय को ख़ूब प्यार करते हैं, उन्हें दुलारते हैं। नागपंचमी के त्यौहार पर विषैले साँपों को दूध पिलाते हैं, ये कृत्य आपके धर्म सम्मत हैं और महार-मांग अपने जैसे इनसानों को तुम इनसान नहीं समझते। उनसे तुम परहेज़ करते हो, उन्हें अछूत, अस्पृश्य समझकर दुत्कारते हो, क्यों करते हो ऐसा? ऐसा करने की सही वजह क्या है? क्या तुम नहीं जानते कि ब्राह्मण लोग तुम्हें भी अछूत ही समझते हैं। हमारे स्पर्श से भी उन्हें नफ़रत है। वे तुमसे भी महार जैसा ही व्यवहार करते हैं, है कि हीं?

मेरी बात सुनकर लज्जित तो हुआ परन्तु कुछ सवाल करने लगा कि क्यों आप लोग महार और मांग जाति को पढ़ाते हो? तुम्हारी इन हरकतों के कारण समाज के लोग तुम्हारे ख़िलाफ़ अपशब्द बोलते हैं, तुम लोगों को कोसते रहते हैं और तुम्हारी राह में काँटे बिछाते रहते हैं, यह मुझसे सहन नहीं होता, यह सब देखकर मुझे भी बहुत तकलीफ़ होती है।

भाई की बात मैंने बड़े धैर्य से सुनी और उसे समझाते हुए बताया कि देखो दूसरे देश के लोग अंग्रेज़ लोग महार-मांग और अन्य जातियों के उत्थान हेतु बहुत काम कर रहे हैं। क्या-क्या काम कर रहे हैं उसे बताया कि कैसे अज्ञानता और अनपढ़ता मनुष्य के लिए घातक है, अविद्या के कारण ही मनुष्य पशुवत है। ब्राह्मण स्वयं को श्रेष्ठतम समझते हैं, क्योंकि उनकी श्रेष्ठता का आधार ज्ञान अथवा शिक्षा का होना ही है। ज्ञान की महिमा अपार है, जो व्यक्ति या जाति शिक्षा पा लेती है या शिक्षित हो जाती है, उसका बौद्धिक विकास होने लगता है। वह अपने अच्छे और बुरे को पहचानने लगता है और अशिक्षा के कारण से मूर्ख, नीच, अनपढ़ जैसे शब्दों और भावों से मुक्ति मिलती है। वह स्वयं श्रेष्ठता की ओर बढ़ने लगता है, उसे सम्मान की नज़र से देखा जाता है। तुम मेरे पति के बारे कुछ नहीं जानते वे एक सच्चे इनसान हैं, वे वास्तव में बहुत महान हैं। आज के समय में हमारे आसपास यहाँ तक कि इस देश में उनकी तुलना में कोई नहीं है, न ही किसी से उनकी तुलना की जा सकती है। उनका ध्येय है कि महार-मांग और स्त्रियाँ शिक्षित होकर इनसान के रूप में स्वयं को स्थापित करते हुए अपना जीवन यापन करें। यही वो वजह है जो जोतीबा और ब्राह्मणों के बीच मतभेद और विवाद का विषय बनकर समाज के धरातल पर चर्चित हो रही है। जोतीबा निर्भीक होकर, ब्राह्मणों के विरोध की परवाह न करके अपने लक्ष्य की पार्टी हेतु डंके की चोट पर मांग, महार, स्त्रियों आदि को निष्ठापूर्वक पढ़ाते हैं। उनके इन आदर्श कार्यों में, मैं हमेशा उनका हाथ बँटाती रहूँगी। इस नेक काम में साथ निभाना कौन-सी अनुचित बात है? हम दोनों पति-पत्नी लड़कियों को पढ़ाते हैं, स्त्रियों को भी पढ़ाते हैं, महार-मांग के साथ-साथ अन्य जाति के लोगों को भी पढ़ाते हैं और हमारा ये कार्य ब्राह्मणों के लिए अपयश और निंदा का कारण बन जाता है। ब्राह्मण अपने हितों पर कुठाराघात होते महसूस करके हमें हमारे सत्य कर्म, मानवता, धर्म के सच्चे रास्ते को बाधित करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। हमें अब्राह्मण कहकर दुत्कारते हैं, धिक्कारते हैं, हमारे कार्यों की निंदा करते हैं। हमारा बहिष्कार करके भी जब वो संतुष्ट नहीं होते तब वे अपने स्थायी समाधान हेतु जुगत लगाते हुए घूमते-फिरते रहते हैं। अपनी योजना को फलीभूत करने के लिए वे लोग तुम्हारे जैसे लोगों को हमारे विरुद्ध भड़काकर तुम्हारा और हमारा नुक़सान करना चाहते हैं। षड्यंत्र रचकर, तुम्हें आगे कर अपनी नीच घिनौनी चाल चलते हैं और तुम उनकी चाल में फँसकर हमारे विरुद्ध प्रचार में जुट जाते हो।

अपनी बात को मज़बूती देने के लिए मैंने आपका उदाहरण देकर अपने भाई को बताया, “तुझे शायद पता न हो लेकिन बताना ज़रूरी है कि मेरे पति द्वारा गाँव-गाँव में विद्यालय खोलने व पढ़ाने की जानकारी की प्रसिद्धी अंग्रेज़ सरकार तक पहुँच गयी है, उनके शिक्षण कार्यों की ख़बर पाकर अंग्रेज़ सरकार ने पुणे में भव्य समारोह आयोजित करके उन्हें शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया था। उनकी इस प्रशंसा से उनके निंदकों को मुँह की खानी पड़ी। मैंने अपने भाई से ये भी कहा कि मेरा पति तुम्हारे जैसे लोगों में से नहीं है जो धर्म यात्रा के नाम पर पढरपुर तक पैदल हरि नाम जपते हुए चलता जाए और अपने लिए पुण्य कमाने का ढोंग करे। वे असली और सच्चा काम करते हैं। मानवता को ज़िन्दा करते हैं, अनपढ़ों को पढ़ा-लिखाकर उन्हें ज्ञान देकर उनके जीवन में रौशनी भरते हैं, उनमें स्वाभिमान जगाकर जीने की राह दिखाते हैं। यही सच्चा रास्ता है। उनका ध्येय अब मेरा भी ध्येय बन गया है। लोगों को शिक्षित करने में मुझे बहुत शांति मिलती है, स्त्रियों को पढ़ाने से मुझे ख़ुद को प्रेरणा, प्रोत्साहन ओर ऊर्जा मिलती है, यह काम मुझे ख़ुशी देता है, इससे मुझे सुख-शांति, आत्मतृप्ति मिलती है, ये ही वो काम है जिसमें इनसानियत और मानवता दीख पड़ती है।

मेरी दृढ़ता भरी बातें माँ और भाई दोनों एकाग्रता से सुन रहे थे। उनके चेहरे से मुझे प्रतीत हुआ कि मेरी कही बातों का कुछ असर तो उन पर हुआ है। मेरी बात समाप्त होते ही भाई ने अपने व्यवहार और अपनी कही बातों के लिए माफ़ी माँगी तो माँ मेरी तरफ़ देखकर ख़ुश होकर बोली, “बेटी, तेरी ज़ुबान पर सरस्वती का निवास है। तेरे मुँह से ज्ञानभरी बातें सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा, ये सब सुनकर मै धन्य हुई।”

माँ और भाई के विचारों में आए बदलाव को देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई, मेरा मन ख़ुशी से झूम उठा।

उपरोक्त विषय में पढ़कर आप समझ गये होंगे कि जिस तरह से पूना में हमारे विरोध में दुष्प्रचार करने वाले, ज़हर फैलाने वाले, निंदक, लोगों को भड़काकर झगड़ा करवाने वाले भरी संख्या में सक्रिय हैं, ठीक उसी तरह यहाँ सतारा में भी इसी तरह के लोग हमारे विरुद्ध सक्रिय हैं। लेकिन उन दुष्ट लोगों से भयभीत होकर हम अपने लक्ष्य से नहीं डिगेंगे। अपने हाथ में लिया शिक्षा का कार्य, महार-मांग, स्त्रियों को पढ़ाने का काम हम हरगिज़ नहीं छोड़ेगे। हमारे जीवन का एक-एक क्षण, एक-एक पल लोगों को शिक्षित करने की ओर, हर समय उनकी भलाई और उन्हें स्वाभिमानी बनाने में देना होगा। हमें विश्वास है हम सफल ज़रूर होंगे। भविष्य में हमारे किये कार्यों का समय मूल्याँकन ज़रूर करेगा, इससे अधिक और क्या लिखूँ…।

आपकी
सावित्री ज्योति

साभार: किताब: सावित्रीबाई फुले रचना समग्र | प्रकाशक: द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन

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