ऐसे तो बहुत तकलीफ़देह
नहीं होता है बहुत

भीड़ में कभी-कभार
उसकी ही होती है ग़लती
जब टकरा जाती है वह
किसी पुरुष से
तब आगे बढ़कर कहते हैं वे साॅरी
खड़े हो जाते हैं अदब से
उठाकर देते हैं उसके हाथ में पर्स
और तनिक मुस्कुराकर
निकल जाते हैं आगे

बस या रेल में
आते हैं वे आगे सहायता के लिए
जब कभी ऊपर की बर्थ तक
नहीं पहुँचते हैं उसके हाथ

जब बीच राह में
बन्द पड़ जाती है उसकी स्कूटी
तब कोई न कोई आता ही है आगे
किक लगाकर हो जाता है एक तरफ़
वह थैंक्स कहे इससे पूर्व
निकल जाता है हड़बड़ी में
कुछ बुदबुदाते हुए

हर समय तो नहीं जगता है न
पुरुष के भीतर का
हिंस्त्र दरिंदा श्वापद…

किसी स्टेशन या कार्यालय में
बैठती है वह सकुचाकर
दो पुरुषों के बीच
तब देते हैं वे उसे जगह
फिर से व्यस्त हो जाते हैं
अपने-अपने मोबाइल या अख़बार में

तब झाँकती है वह यूँ ही अख़बार में
और नज़र आ ही जाती है उसे
बलात्कार, छेड़छाड़
या यौन-शोषण की कोई ख़बर

ऐसे तो बहुत तकलीफ़देह होता नहीं है कुछ
फिर भी
स्वंय को सम्भालकर
बैठी रहती है वह
दो पुरुषों के बीच!

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