मैं शब्दों पर शब्दों का ढेर
लगाता हूँ

उपमाओं की उपमाओं से
अलंकारों की अलंकारों से
बनाता चलता हूँ शृंखला

जो और जैसे भी छंद अँटते व जँचते
ही नहीं
बल्कि ख़ुद ब ख़ुद निकल पड़ते हों
अपने दड़बे और माँद से
मैं ले लेता हूँ साथ
शब्द कोई मिल जाए किसी भाषा का
या फिर कोई परिचय या अबूझ संकेत
आगे बढ़ा लेता हूँ अभिव्यक्ति का क़ाफ़िला

माफ़ कीजिएगा
मैं स्वच्छता अभियान को
नहीं लगा रहा हूँ पलीता पढ़े-लिखों की दुनिया में

मैं तो बस अर्थ को बचाने का कर रहा हूँ उपक्रम
जो निष्कवच हुआ तो
मर जाएगा
हो जाएगा निस्तेज
सच को आग की तरह रखा जाना चाहिए महफ़ूज़

मैं कविता को आग का पर्याय मानता हूँ।

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डॉ. अभिज्ञात
शिक्षा- कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी में पीएच.डी.। दस कविता संग्रह, दो कहानी संग्रह और दो उपन्यास प्रकाशित। पेशे से पत्रकार। कुछ फिल्मों में अभिनय।

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