आग सीने में बड़ी तेज़ जला रख्खी है,
मेरी शोहरत ने तेरी नींद उड़ा रख्खी है।

शहर में जब से हवा चलने लगी है मेरी,
मेरे दुश्मन ने उछल कूद मचा रख्खी है।

लुट गया जो भी बुज़ुर्गों से मिला था हम को,
सर पे दस्तार मगर अब भी बचा रख्खी है।

ग़ैर मुमकिन है मुझे कोई बला छू जाए।
माँ के हाथों ने मेरे सर पे दुआ रख्खी है।

मोहसिन आफ़ताब केलापुरी

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