अनुवाद: सुशांत सुप्रिय

आज रात आप सब जो कहानियाँ सुना रहे हैं, उन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। एक तो वे कहानियाँ हैं जिनमें एक ओर जीवित लोगों की दुनिया है, दूसरी ओर मृत्यु की दुनिया है, और कोई शक्ति है जो एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आना-जाना संभव बना रही है। भूत-प्रेत आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं। दूसरी तरह की कहानियों में पराभौतिक क्षमता, पूर्वाभास और भविष्यवाणी करने की क्षमता शामिल है। आप सब की सारी कहानियाँ इन्हीं दो श्रेणियों से संबंधित हैं।

असल में आप लोगों के सारे अनुभव भी लगभग इन्हीं दो श्रेणियों में रखे जा सकते हैं। मेरे कहने का अर्थ है, जिन लोगों को भूत दिखते हैं, उन्हें केवल भूत ही दिखते हैं। उन्हें कभी किसी अनहोनी का पूर्वाभास नहीं होता। दूसरी ओर, जिन्हें ऐसा पूर्वाभास होता है, उन्हें कभी भूत नहीं दिखते। मुझे नहीं पता, ऐसा क्यों है।

शायद यह पहली या दूसरी बात के प्रति आपके व्यक्तिगत झुकाव की वजह से हो। कम से कम मुझे तो यही लगता है।

पर कुछ लोग इन दोनों में से किसी श्रेणी में नहीं आते। उदाहरण के लिए मुझे ही ले लें। अपने तीस बरस की उम्र में मैंने कभी कोई भूत नहीं देखा, न ही मुझे कभी कोई पूर्वाभास हुआ, या भविष्यवाणी करने वाला कोई सपना ही आया। एक बार मैं एक लिफ्ट में कुछ मित्रों के साथ था। उन्होंने कसम खा कर कहा कि लिफ्ट में हमारे साथ एक भुतहा परछाईं भी थी। पर मुझे कुछ भी नहीं दिखा। उन्होंने दावा किया कि मेरे ठीक बगल में सलेटी वस्त्र पहने एक महिला की धुँधली आकृति मौजूद थी। पर हमारे साथ कोई महिला उस लिफ्ट में थी ही नहीं। कम-से-कम मुझे तो कोई आकृति नहीं दिखी। मैं, और मेरे दो अन्य मित्र – हम तीन ही उस लिफ्ट में मौजूद थे। मैं मजाक नहीं कर रहा। और मेरे ये दोनों मित्र ऐसे लोग नहीं थे जो मुझे डरा कर बेवकूफ बनाने के लिए झूठ बोलें। तो यह सारा मामला बेहद असामान्य था, पर असली बात यही है कि मुझे आज तक कोई भूत दिखाई ही नहीं दिया।

पर एक बार की बात है – केवल एक बार – जब मुझे ऐसा डरावना अनुभव हुआ था कि मेरी घिग्घी बँध गई थी। इस भयावह घटना को घटे दस बरस से भी ज्यादा अरसा हो गया, पर मैंने कभी किसी को इसके बारे में कुछ नहीं बताया। मैं इस घटना का जिक्र करने के ख्याल से भी डरता था। मुझे लगता था कि उल्लेख मात्र से यह घटना दोबारा घटित होने लगेगी। इसलिए मैं इतने साल चुप रहा। लेकिन आज रात आप सभी ने अपना-अपना कोई भयावह अनुभव सुनाया है, और मेजबान होने के नाते मेरा भी यह फर्ज है कि मैं अपना ऐसा ही कोई अनुभव आप सबको सुनाऊँ। तो प्रस्तुत है मेरे उस डरावने अनुभव की कहानी:

1960 के दशक के अंत में छात्र-आंदोलन अपने पूरे शबाब पर था। यही वह समय था जब मैंने विद्यालय की शिक्षा पूरी कर ली। मैं ‘हिप्पी पीढ़ी’ का हिस्सा था, इसलिए मैंने आगे की पढ़ाई के लिए विश्वविद्यालय में दाखिला लेने से इनकार कर दिया। इसकी बजाय मैं जापान भर में घूम-घूम कर जगह-जगह श्रमिकों के लिए उपयुक्त नौकरियाँ करता रहा। मुझे पक्का यकीन हो गया था कि जीवन जीने का सबसे सही तरीका मेहनत-मजदूरी करना ही था। मेरे ख्याल से आप मुझे युवा और अधीर कहेंगे। आज पीछे मुड़ कर देखने पर मुझे लगता है कि उस समय मैं एक मजेदार जीवन जी रहा था। ऐसे जीवन का मेरा चुनाव चाहे सही था या गलत, यदि मुझे फिर से चयन का मौका मिलता तो मुझे पूरा यकीन है कि मैं दोबारा वही जीवन चुनता।

पूरे देश में घूमते रहने के मेरे दूसरे बरस के पतझर के दौरान मुझे कुछ महीने के लिए एक विद्यालय में रात के चौकीदार की नौकरी मिली। यह विद्यालय निगाता क्षेत्र के एक छोटे-से शहर में था। गर्मियों में लगातार मेहनत-मजदूरी वाला काम करने की वजह से मैं बेहद थकान महसूस कर रहा था। इसलिए मैं कुछ समय के लिए थोड़ी आसान-सी नौकरी चाहता था। रात के समय चौकीदार का काम करने के लिए विशेष कुछ नहीं करना पड़ता। दिन के समय मैं स्कूल के परिचारक के दफ्तर के एक कमरे में सो जाता था। रात में मुझे केवल दो बार पूरे विद्यालय का चक्कर लगा कर यह सुनिश्चित करना होता था कि सब कुछ ठीक है। बाकी बचे समय में मैं संगीत सुनता, पुस्तकालय में जा कर किताबें पढ़ता और जिम में जा कर अकेले ही बास्केटबॉल खेलता। किसी स्कूल में पूरी रात अकेले रहना इतना बुरा भी नहीं होता। क्या मैं भयभीत था? बिलकुल नहीं। जब आप अठारह या उन्नीस साल के होते हैं तो आपको किसी चीज की परवाह नहीं होती।

मुझे नहीं लगता कि आप में से किसी ने रात में चौकीदार के रूप में काम किया होगा, इसलिए मुझे आपको चौकीदार के काम-काज के बारे में बता देना चाहिए। आपको रात में रखवाली करते हुए दो चक्कर लगाने होते हैं – एक नौ बजे और दूसरा तीन बजे। यही आपका कार्यक्रम होता है। जिस विद्यालय में मुझे नौकरी मिली थी, उसकी एक पुख्ता तिमंजिला इमारत थी। उसमें लगभग बीस कमरे थे। यह एक बहुत बड़ा स्कूल नहीं था। कक्षा के कमरों के अलावा संगीत-शिक्षण के लिए एक कमरा था, कला-शिक्षण के लिए एक स्टूडियो था और एक विज्ञान-प्रयोगशाला थी। इसके अतिरिक्त शिक्षकों के बैठने के लिए एक बड़ा कमरा था और प्रधानाचार्य का दफ्तर था। कॉफी पीने की एक दुकान, एक तरणताल, एक व्यायामशाला और एक नाट्यशाला भी विद्यालय का हिस्सा थे। रात में दो बार इन सब का चक्कर लगाना मेरे काम में शामिल था।

जब मैं रात में रखवाली करते हुए स्कूल में चक्कर लगा रहा होता, तो मैं साथ-साथ एक बीस-सूत्री जाँच-सूची पर भी निशान लगाता चलता। शिक्षकों के बैठने का कमरा – सही …विज्ञान-प्रयोगशाला – सही …मुझे लगता है, मैं परिचारक के कमरे के बिस्तर पर बैठे-बैठे भी सही के निशान लगा सकता था। तब मैं रात में विद्यालय का चक्कर लगाने की जहमत से बच जाता। लेकिन मैं इतना गैर-जिम्मेदार व्यक्ति नहीं था। यूँ भी विद्यालय का चक्कर लगाने में ज्यादा समय नहीं लगता था। इसके अलावा, यदि कोई रात में चोरी के इरादे से स्कूल में घुस आता तो जवाबदेही तो मेरी ही बनती।

जो भी हो, हर रात मैं दो बार – नौ बजे और तीन बजे, रखवाली करते हुए पूरे विद्यालय का चक्कर लगाता था। मेरे बाएँ हाथ में टॉर्च होती, जबकि दाएँ हाथ में लकड़ी की एक पारंपरिक तलवार होती। मैंने अपने स्कूल के दिनों में पारंपरिक तलवारबाजी सीखी थी, इसलिए मुझे किसी भी हमलावर को भगा देने की अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा था। यदि कोई हमलावर पेशेवर नहीं होता और उसके पास असली तलवार होती, तो भी मैं उससे नहीं घबराता। याद रखिए, उस समय मैं युवा था। अगर आज की तारीख में ऐसी कोई बात हो जाए, तो मैं जरूर वहाँ से भाग जाऊँगा।

खैर! यह घटना अक्टूबर महीने की एक तूफानी रात में घटी। असल में, साल के इस माह के हिसाब से मौसम बेहद उमस भरा था। शाम से ही मच्छरों के झुंड मँडराने लगे। मुझे याद है, मैंने मच्छरों को भगाने वाली कई टिकिया जलाई ताकि इन बदमाशों को दूर रखा जा सके। बाहर आँधी का कर्ण-भेदी शोर था। तरणताल का दरवाजा टूटा हुआ था और तेज हवा में खटाखट बज रहा था। मैंने सोचा कि कील ठोककर दरवाजे को दुरुस्त कर दूँ, लेकिन बाहर घुप्प अँधेरा था। इसलिए वह दरवाजा सारी रात यूँ ही बजता रहा।

उस रात नौ बजे रखवाली के लिए लगाए गए स्कूल के चक्कर में सब ठीक-ठाक रहा। मैंने जाँच-सूची के सभी बीस मदों पर सही का साफ निशान लगा दिया। सभी कमरों के दरवाज़ों पर ताला लगा था और हर चीज अपनी जगह पर थी। कहीं कुछ भी अजीब नहीं लगा। मैं वापस परिचारक के कमरे में गया, जहाँ मैंने घड़ी में तीन बजे उठने के लिए अलार्म लगाया। बिस्तर पर लेटते ही मुझे नींद आ गई।

तीन बजे अलार्म बजने पर मैं जग तो गया लेकिन मुझे कुछ अजीब महसूस हो रहा था। मैं आप को ठीक से यह समझा नहीं सकता, लेकिन मुझे कहीं कुछ अलग-सा लगा। मेरा उठने का मन भी नहीं हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई चीज बिस्तर से उठने की मेरी इच्छा को दबा रही थी। आम तौर पर मैं उछल कर बिस्तर से उठ खड़ा होता हूँ, इसलिए मैं भी कुछ नहीं समझ पा रहा था। मुझे जैसे खुद को धक्का दे कर बिस्तर से उठाना पड़ा, ताकि मैं स्कूल की रखवाली वाला तीन बजे का चक्कर लगाने जा सकूँ। बाहर तरणताल का टूटा दरवाजा अब भी तेज हवा में बज रहा था, पर उसके बजने की आवाज अब पहले से अलग लग रही थी। कहीं-न-कहीं कुछ तो जरूर अजीब है – बाहर जाने के प्रति अनिच्छुक होते हुए मैंने सोचा। किंतु फिर मैंने अपना मन बना लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे अपना काम करने जाना ही है। यदि आप एक बार अपने कर्तव्य से विमुख हो गए, तो आप बार-बार अपने कर्तव्य से विमुख होंगे, और मैं इस झमेले में नहीं पड़ना चाहता था। इसलिए मैंने अपनी टॉर्च और अपनी लकड़ी की तलवार उठाई और विद्यालय का चक्कर लगाने के लिए निकल पड़ा।

यह वाकई बहुत अजीब-सी रात थी। जैसे-जैसे रात गहरी हो रही थी, हवा की रफ्तार बेहद तूफानी होती जा रही थी, और हवा में नमी भी बढ़ती जा रही थी। मेरे शरीर में जगह-जगह खुजली होने लगी, और किसी भी चीज पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाना मेरे लिए मुश्किल होने लगा। मैंने पहले व्यायामशाला, नाट्यशाला और तरणताल का चक्कर लगाने का निश्चय किया। वहाँ सब कुछ ठीक-ठाक था। तरणताल का अध-टूटा दरवाजा तूफानी हवा में इस तरह लयहीन-सा बज रहा था जैसे उसे पागलपन का दौरा पड़ा हो। उसके बजने की आवाज डरावनी और अजीब लग रही थी।

स्कूल की इमारत के भीतर स्थिति सामान्य थी। मैं हर ओर देखते हुए अपनी बीस-सूत्री जाँच-सूची पर सही का निशान लगाता जा रहा था। हालाँकि मुझे कहीं कुछ अजीब लग रहा था, लेकिन वास्तव में अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिसे अजीब कहा जाता। चैन की साँस लेकर मैं परिचारक के कमरे की ओर लौटने लगा। मेरी जाँच-सूची में अब केवल अंतिम जगह ‘विज्ञान-प्रयोगशाला’ बच गई थी। यह प्रयोगशाला इमारत के पूर्वी हिस्से में कॉफी पीने की दुकान के बगल में स्थित थी। परिचारक का कमरा यहाँ से ठीक उलटी दिशा में पड़ता था। इसका मतलब था कि लौटते हुए मुझे पहली मंजिल के लंबे गलियारे को पार करना था। वहाँ घुप्प अँधेरा था। जब आकाश में चाँद निकला होता, तो उस गलियारे में हल्की रोशनी होती थी। पर जब ऐसा नहीं होता, तो वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता। उस रात भी घुप्प अँधेरे में आगे का रास्ता देखने के लिए मुझे टॉर्च की रोशनी का सहारा लेना पड़ रहा था। दरअसल मौसम विभाग के अनुसार उस इलाके में एक चक्रवात के आने का अंदेशा था। इसलिए चाँद दिखाई नहीं दे रहा था। बाहर आकाश में केवल बादलों की भीषण गड़गड़ाहट थी और नीचे जमीन पर तूफानी हवा का भयावह शोर था।

मैं और दिनों की अपेक्षा तेजी से उस गलियारे को पार करने लगा। मेरे जूतों में लगे रबड़ के फर्श पर हो रहे घर्षण से उस सन्नाटे में एक अजीब-सी आवाज पैदा हो रही थी। वह फर्श काई के रंग का था। मुझे आज भी याद है।

स्कूल का प्रवेश-द्वार आधा गलियारा पार करने के बाद आता था, और जब मैं वहाँ से गुजरा तो मुझे लगा… वह क्या था? मुझे लगा जैसे मुझे अँधेरे में कोई चीज दिखी। मैं बुरी तरह घबरा गया। मेरे माथे और कनपटियों से पसीने की धारा बह निकली। तलवार की मूठ पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए मैं उस ओर मुड़ा जिधर मुझे कुछ दिखा था। मैंने अपनी टॉर्च की रोशनी जूते रखने के खाने के बगल वाली दीवार पर डाली।

ओह! तो यह बात थी। दरअसल वहाँ एक आदमकद आईना रखा था जिसमें मेरा प्रतिबिंब नजर आ रहा था। लेकिन पिछली रात तो यहाँ कोई आईना नहीं रखा था। यानी कल दिन में ही किसी ने यह आईना यहाँ डाल दिया होगा। हे भगवान, मैं कितना घबरा गया था।

जैसा कि मैंने बताया, वह एक आदमकद आईना था। आईने में वह महज मेरा प्रतिबिंब था, यह देख कर मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई। लेकिन साथ ही मुझे अपने बुरी तरह घबरा जाने की बात बेहद बेवकूफाना लगी। तो सिर्फ यह बात थी – मैंने खुद से कहा। क्या बेवकूफी है! मैंने अपनी टॉर्च नीचे रख कर जेब से एक सिगरेट निकाली और सुलगा ली। मैंने एक गहरा कश ले कर उस आईने में अपने प्रतिबिंब की ओर निगाह डाली। बाहर सड़क से एक मद्धिम रोशनी खिड़की के रास्ते उस आईने तक पहुँच रही थी। मेरे पीछे स्थित तरणताल का अध-टूटा दरवाजा तूफानी हवा में अब भी लयहीन-सा बज रहा था।

सिगरेट के कुछ गहरे कश लेने के बाद मुझे अचानक एक अजीब बात नजर आई – आईने में दिख रहा मेरा प्रतिबिंब दरअसल मैं नहीं था। बाहर से वह बिलकुल मेरी तरह लग रहा था, लेकिन यकीनन वह मैं नहीं था। नहीं, यह बात नहीं थी। वह ‘मैं’ तो था लेकिन कोई ‘दूसरा’ ही मैं था। कोई दूसरा मैं, जिसे नहीं होना चाहिए था। मुझे नहीं पता, मैं इसे आपको कैसे समझाऊँ। मुझे उस समय कैसा महसूस हो रहा था, यह बयान कर पाना कठिन है।

जो बात मैं समझ पाया वह यह थी कि आईने में मौजूद वह प्रतिबिंब मुझसे बेइंतहा नफरत करता था। उसके भीतर भरी घृणा अँधेरे समुद्र में तैर रहे किसी हिम-खंड-सी थी। एक ऐसी नफरत जिसे कोई कभी मिटा न सके।

मैं कुछ देर वहाँ हक्का-बक्का-सा खड़ा रह गया। मेरी सिगरेट मेरी उँगलियों से फिसल कर फर्श पर गिर पड़ी। आईने में मौजूद सिगरेट भी फर्श पर गिर पड़ी। एक-दूसरे को घूरते हुए हम वहाँ खड़े रहे। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे हाथ-पैर बाँध दिए हों। मैं हिल भी नहीं पा रहा था।

आखिर उसका हाथ हिला। उसके दाएँ हाथ की उँगलियों ने उसकी ठोड़ी को छुआ, और फिर एक कीड़े की तरह धीरे-धीरे वे उँगलियाँ उसके चेहरे की ओर बढ़ीं। अचानक मैंने महसूस किया कि मेरी उँगलियाँ भी ठीक वैसी ही हरकतें कर रही थीं। गोया मैं आईने में बैठे व्यक्ति का प्रतिबिंब था और वह मेरी हरकतों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा था।

भीतर से अपनी अंतिम शक्ति एकत्र कर के मैं जोर से चीखा, और मुझे अपनी जगह पर जकड़ कर रखने वाले बंधन जैसे टूट गए। मैंने अपने हाथ में पकड़ी लकड़ी की तलवार ऊपर उठाई और उस आदमकद आईने पर जोर से दे मारी। मैंने काँच के चटख कर चूर-चूर होने की आवाज सुनी, पर अपने कमरे की ओर बेतहाशा भागते हुए मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। कमरे में पहुँचते ही मैंने दरवाजा भीतर से बंद किया और बिस्तर पर पड़ी रजाई में घुस गया। हालाँकि मुझे अपनी जलती सिगरेट के वहाँ फर्श पर गिर जाने की चिंता हुई, पर अब मैं वहाँ वापस तो किसी हालत में नहीं जाने वाला था। बाहर तूफानी हवा प्रचंड वेग से शोर मचाती रही। तरणताल का अधटूटा दरवाजा भी सुबह तक बौराया और लयहीन-सा उसी तरह बजता रहा…

मुझे पूरा विश्वास है, आपने मेरी कहानी का अंत जान लिया होगा। दरअसल वहाँ कभी कोई आईना था ही नहीं।

सूर्योदय होने से पहले ही चक्रवात का कहर खत्म हो चुका था। तूफानी हवा चलनी बंद हो गई थी, और बाहर एक धुपहला दिन निकल आया था। मैं स्कूल के मुख्य द्वार पर गया। मेरी उँगलियों से फिसल कर गिर गई सिगरेट का टुकड़ा अब भी वहीं था। मेरी टूटी हुई तलवार भी वहीं पड़ी थी। लेकिन वहाँ कोई आईना नहीं था। टूटे हुए काँच के टुकड़े भी नहीं थे। बाद में पूछताछ करने पर मुझे पता चला कि वहाँ कभी किसी ने कोई आईना रखा ही नहीं था।

मैंने वहाँ जो देखा, वह भूत नहीं था। वह तो मैं ही था। मैं इस बात को कभी नहीं भूल पाता कि मैं उस रात कितना डर गया था। जब भी मुझे वह रात याद आती है, मेरे जहन में यही विचार कौंधता है कि विश्व में सबसे डरावनी चीज हमारा अपना ही रूप है। आप इस के बारे में क्या सोचते हैं?

आपने पाया होगा कि यहाँ मेरे इस घर में एक भी आईना नहीं है। मेरी बात पर विश्वास कीजिए – बिना आईने के दाढ़ी बनाना सीखना कोई आसान काम नहीं था।

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हारुकी मुराकामी
हारुकी मुराकामी (जन्म- 12 जनवरी, 1949) एक जापानी उपन्यासकार हैं जिनकी कृतियाँ 50 से अधिक भाषाओं में अनुवादित करी जा चुकी हैं और जिनकी करोड़ों प्रतियाँ विश्वभर में बिक चुकी हैं। इनके उपन्यासों में अकेलेपन और अतियथार्थवाद की छवियाँ मिलती हैं।