‘Aakhiri Ichchha’, a poem by Anurag Anant

मैं आसमान से एक तारे की तरह टूटा
और प्रेमियों ने मुझे देखकर आँखें मूँद लीं
हाँथ जोड़े और मन में मिलन की मुराद माँगी
यही रीति, यही नीति रही है दुनिया की
जिन्हें जो नहीं मिला उनसे वही चीज़ माँगी जाती रही है

ग़लतियाँ करके सीखने वाले उखड़ पर स्थापित हुए विश्वविद्यालयों की तरह
बेचैनी ओढ़कर सोए और मज़ार बन गए
बारिश में जो सिर खोलकर सरमद-सा नाचे
लोग उनकी क़ब्र पर सर ढाँककर सजदे करते मिले
तुम्हारी बुदबुदाती प्रथनाएँ अगर उन्हें उलहाना लगें तो कोई बुरा ना माने
ज़िन्दगी के लिए तरसकर मरे लोगों के झुके कँधों पर टँगी है दुनिया
जैसे कीलों पर टँगी हैं तस्वीरें

मेरी आख़िरी इच्छा नहीं पूछी गई और मुझ जैसों से भी नहीं पूछी जाएगी उनकी अंतिम इच्छा
अगर हो ये बेवजह की रस्म तो पूरे विश्वास से कह सकता हूँ
कि बस एक ही इच्छा होगी मुझ जैसे टूटे हुए दिल की
कि किसी भूखे आदमी द्वारा अगर नोच लिया जाए चाँद
और रोटी समझकर चबा लिया जाए
तो उसपर देशद्रोह का मुक़दमा ना चलाया जाए
अगर नदियों को आँखों की कोरों में भर लेने की कोई बचकाना ज़िद करे तो उसे ये करने दिया जाए
अगर कोई अपनी तंग जेब में रख ले दुनिया भर की लड़कियों की हँसी और मूँगफली के दानों सा फाँके उन्हें अकाल के दिनों में तो कोई सरकार आँखें ना तरेरे
अगर पाँवों में बाँध ले कोई सम्भावनाओं का समुद्र
अगर कोई अपनी अँगुली के पोरों पर गिने सातों दिन
बारहों महीने और चौबीसों घण्टे तो उसे गिनने दिया जाए
अगर कोई बच्चों की तरह पैर पटककर दुनिया को चटका दे तो कोई एतराज़ ना करे
अगर कोई उतर जाए आँखों पर चढ़कर निगाह से तो बुरा ना माने कोई भी
अगर कोई नुकीली कविता रचे कोई छलती हुआ हृदय तो अपराधी ना कहे उसे कोई

बस यही चाहता हूँ मैं
ये शर्त है मेरी और यही आख़िरी इच्छा भी
फिर चाहे मुझे चौराहे पर खड़ा करके जला दिया जाए
रावण नाम देते हुए
या मेरी नाभि पर चलाया जाए तीर और देवता फूल बरसाएँ मेरी मृत्यू पर
फिर चाहे मेरी मरने की तारीख़ त्योहार कही जाए
और मज़दूर परदेश से गठरियों की तरह लदे फँदे लौटे अपने मुल्क अपनों के बीच
मेरा सुकून चाय की चढ़ी पतीलियों में है
जिसमें परिवार भर का सानिध्य खदबदा रहा है!

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