एक-इक ईंट गिरी पड़ी है
सब दीवारें काँप रही हैं
अन-थक कोशिशें मेमारों की
सर को थामे हाँफ रही हैं
मोटे-मोटे शहतीरों का
रेशा-रेशा छूट गया है
भारी-भारी जामिद पत्थर
एक-इक करके टूट गया है
लोहे की ज़ंजीरें गलकर
अब हिम्मत ही छोड़ चुकी हैं
हल्क़ा-हल्क़ा छूट गया है
बंदिश-बंदिश तोड़ चुकी हैं
चूने की इक पतली-सी तह
गिरते-गिरते बैठ गई है
नब्ज़ें छूट गईं मिट्टी की
मिट्टी से सर जोड़ रही हैं
सब कुछ ढेर है अब मिट्टी का
तस्वीरें वो दिलकश नक़्शे
पहचानो तो रो दोगी तुम
घर में हूँ, बाहर हूँ घर से
अब आओ तो रक्खा क्या है
चश्मे सारे सूख गए हैं
यूँ चाहो तो आ सकती हो
मैंने आँसू पोंछ लिए हैं!

अख़्तर-उल-ईमान की नज़्म 'मस्जिद'

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अख़्तर-उल-ईमान
अख़्तर-उल-ईमान का जन्म 12 नवम्बर 1915 को किला, नजीबाबाद उत्तर प्रदेश में हुआ। ये मुख्यत: नज़्म के शायर थे। ये आधुनिक उर्दू नज़्म के संस्थापकों में शामिल हैं। उर्दू नज़्म पर इनका काफ़ी प्रभाव रहा है। फ़िल्म धर्मपुत्र (1963) और वक़्त (1966) में संवाद लेखन के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला। 1962 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हुए और 1996 में इनका निधन हो गया।