एक स्त्री प्यार करना चाहती थी
लेकिन प्यार करने से चरित्र नष्ट होता है

स्त्री प्यार करना चाहती थी
किन्तु चरित्र नहीं नष्ट करना चाहती थी

एक स्त्री इस तरह प्यार करना चाहती थी
कि प्यार बना रहे। चरित्र बना रहे

स्त्री जितना प्यार के हाथों मजबूर थी
उतना ही चरित्र की जलवायु से परेशान

स्त्री इसलिए चरित्रवान् होना चाहती थी
क्योंकि स्त्रियाँ चरित्रवान् होती हैं
क्योंकि चरित्रवान् होना स्त्री के लिए अनिवार्य है
क्योंकि गणतंत्र में स्त्री का काम ही क्या
सिवाय इसके कि स्त्री अपना चरित्र बनाए रखे

स्त्री स्त्री थी
स्त्री बार-बार भूल जाती थी
और प्यार कर बैठती थी

जी हाँ सामाजिको! उसके बाद
चरित्रवान् होने की हाय हाय और
हाय हाय चरित्र की हाय हाय
नागरिको! महानुभावो! विचारको! सिद्धान्तकारो! नीतिकारो! बौद्धिको! और साहित्यिको!
आपकी कृपा बनी रहे

वह स्त्री जो मुझे प्यार करती थी, चरित्रवान् होने के लिए
आपके गणतंत्र की ओर लौट गयी है
आप उसे सम्भालें और उसे अपना भरपूर
वृद्ध, सिद्धहस्त, विदूषक और निर्वीर्य प्यार दें!

***

साभार: किताब: प्रार्थना के शिल्प में नहीं | लेखक: देवी प्रसाद मिश्र | प्रकाशक: लोकभारती प्रकाशन

देवी प्रसाद मिश्र की कविता 'औरतें यहाँ नहीं दिखतीं'

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