‘Aapne Qadr Kuchh Na Ki Dil Ki’
a ghazal by Hasrat Mohani

आप ने क़द्र कुछ न की दिल की
उड़ गई मुफ़्त में हँसी दिल की

ख़ू है अज़-बस कि आशिक़ी दिल की
ग़म से वाबस्ता है ख़ुशी दिल की

याद हर हाल में रहे वो मुझे
अल-ग़रज़ बात रह गई दिल की

मिल चुकी हम को उन से दाद-ए-वफ़ा
जो नहीं जानते लगी दिल की

चैन से महव-ए-ख़्वाब-ए-नाज़ में वो
बेकली हम ने देख ली दिल की

हमा-तन सर्फ़-होश्यारी-ए-इश्क़
कुछ अजब शय है बे-ख़ुदी दिल की

उन से कुछ तो मिला वो ग़म ही सही
आबरू कुछ तो रह गई दिल की

मर मिटे हम न हो सकी पूरी
आरज़ू तुम से एक भी दिल की

वो जो बिगड़े रक़ीब से ‘हसरत’
और भी बात बन गई दिल की…

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हसरत मोहानी
मौलाना हसरत मोहानी (1 जनवरी 1875 - 1 मई 1951) साहित्यकार, शायर, पत्रकार, इस्लामी विद्वान, समाजसेवक और आज़ादी के सिपाही थे।

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