नहीं, नहीं, अब नहीं हैं रोनी हृदय की व्यथाएँ

जो जगत् व्यथा देता है, उसी जगत् को अब
रचकर गाथाएँ व्यथा की वापस नहीं देनी हैं।
दुःख से जो हमें पीड़ित करता है
बदले में उसे दुःखगीत देना क्यों?

हृदय बेचारा हो गया है ऐसा आर्द्र
सभी स्पर्शों से काँप उठता
करके चीत्कार गीत में।
गीतमय चीख़ सुनकर
अधिक के लोभ से, उत्साह से
स्पर्श कर जाते हैं सब कोई पुनः पुनः उसे।
वर्तमान वज्र का मिज़राब लेकर डट गया है
इस तंत्री में से सभी स्वर छेड़ने को;
वह नहीं समझता ज़रा भी हृदय की पीड़ा।

फिर भी मन मसोसकर ख़ूब गाना!
गाना;
भले ही कभी विषम हो उठे वर्तमान,
किन्तु कोई क़सूर नहीं
अनागत पीढ़ियों का।

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