और फिर
एक समय के पश्चात
इच्छाओं का रक्तबीज
स्वयं करने लगता है
अवसाद की उल्टियाँ

सफलता का महिषासुर
पैरों तले रौंद दिया जाता है
परिवार, प्यार, समाज, उत्तरदायित्व,
लोक-लज्जा, संशय, उपेक्षा और समय की
अष्टभुजाओं द्वारा

एक समय के पश्चात
जब साँसों की गिनती
उल्टी चलती महसूस होती है
और बढ़ती आयु के साथ
जीवन में हर रोज़ एक नयी
चुनौती रावण के सिर की तरह प्रकट होती है

जब नींद आँखों से रूठ जाती है
और अकेलापन
जीवन का सबसे स्थायी भाव बन जाता है,
जब अवसाद की दवाएँ
आत्मबल से अधिक
सरल जान पड़ती हैं और समुद्र पर सेतु बाँधना
केवल एक निरी कथा लगती है

जब रक्त-सम्बन्ध
किसी लक्ष्मण रेखा के पार करते ही
सीता की तरह हर लिए जाते हैं,
जब समीप आता हर एक व्यक्ति
एक नयी उलझन
नये दुःख का
हेतु जान पड़ता है

और फिर एक समय के पश्चात
रोज़मर्रा के कामों को
पूरी ईमानदारी
और समय पर ख़त्म करने का प्रयास ही
बन जाता है
ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापन का कारण एवं
जीवन की सबसे बड़ी
आत्मसंतुष्टि…

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