गुलाबी सुर्ख़ नीली सब्ज़
मेरे पास हर मौसम की साड़ी है
बनारस
और कोटा सिल्क की
मैसूर की साड़ी
दिवाली, ईद, होली की शबे आशूर की साड़ी

दोपट्टे जो चुने थे उनकी चुन्नट भी सलामत है
कहा था माँ ने इनको जल्द धोना मत
यूँही गोला बनाकर इनको रखना ये रवायत है

पुराने लखनऊ से जो लिया कोल्हापुरी जूता
कलाबत्तू पे उसके आब बाक़ी है
फ़िरोज़ाबाद की चूड़ी पे अब तक नुकराई मेहराब बाक़ी है

वो इक कश्मीर वाली शाल पश्मीना
हरारत बख़्शती है सर्द शामों में
के जिसका नाम नामों में

चिकन के शोख़ कुर्ते
और जयपुर की वो चुनरी बाँधनी वाली
छुपी है जिसके धागों में पुरानी दिलकशी मेरी
उन्ही रंगों
उन्ही जज़्बों में उलझी है
ज़रा सी ज़िंदगी मेरी

मेरा छोटा सा मेकप बक्स
मेरे रूप को गुलनार करता है
गुलो गुलज़ार करता है
सुनो!
मुझको डराओ मत!!
अभी से कौन मरता है??

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