कविता संग्रह ‘सिर्फ़ पेड़ ही नहीं कटते हैं’ से

तार टेलीफ़ोन के खम्भों के लिए
हर बार मैं काटा गया हूँ
मकानों की नींव के लिए
मेरी जड़ें कटती रही हैं

सबके पास अपनी-अपनी कुल्हाड़ियाँ हैं
और मैं एक मासूम पेड़ हूँ

पतंग उड़ाने और
तितलियों के पर गिनने की
यह उम्र नहीं
बेकारी के इन दिनों में
मैं एक अधूरा कथानक
और बीस-पच्चीस की कच्ची-पक्की उम्र हूँ

चौराहों पर हुई दुर्घटनाओं
और घरों में लड़े गए युद्धों का हाल
मैं जानता हूँ
जानता हूँ यहाँ
कैसे मारा जाता है अभिमन्यु
कैसे चीरी जाती है द्रौपदी
और आधा झूठ कैसे कहलाता है धर्मराज!

मत तलाशो माँ!
मेरे हाथों में लम्बी उम्र की रेखा
मैं तुम्हारे पेट से
आत्महत्या की तरकीबें सीखकर आया हूँ!

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राजेन्द्र उपाध्याय
जन्म : 20 जून, 1958, सैलाना, ज़िला रतलाम (म० प्र०) | शिक्षा : बी०ए०, एल०एल०बी०, एम०ए० (हिंदी साहित्य) | कृतियां : 'सिर्फ़ पेड़ ही नहीं कटते हैं' (कविता-संग्रह, 1983), 'ऐशट्रे' (कहानी-संग्रह, 1989), 'दिल्ली में रहकर भाड़ झोंकना' (व्यंग्य-संग्रह, 1990), 'खिड़की के टूटे हुए शीशे में' (कविता-संग्रह, 1991), ‘लोग जानते हैं' (कविता-संग्रह, 1997, पुरस्कृत), डॉ० प्रभाकर माचवे पर साहित्य अकादेमी से मोनोग्राफ, 2004, 'रचना का समय' (गद्य-संग्रह, 2005) समीक्षा आलोचना, 'मोबाइल पर ईश्वर' (कविता-संग्रह 2005), 'रूबरू' (साक्षात्कार-संग्रह, 2005), 'पानी के कई नाम हैं' (कविता-संग्रह, 2006), 'दस प्रतिनिधि कहानियों : रवीन्द्रनाथ ठाकुर' (कहानी-संग्रह, 2006) संपादन।

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