‘Aboojh Bhasha Ka Prem’, poems by Preeti Karn

1

तुम्हें अब तक सीख लेनी चाहिए
कविता की अबूझ भाषा!
ऐसा कुछ भी अज्ञात नहीं
जो इसकी परिधि के परे है
शायद!
अप्राप्य को प्राप्त करने की
सुलभता यहीं
सीखी है मैंने भी!

2

हैरत में अपने आसपास
खंगालते हैं परछाईयाँ
यक़ीन तब आता है
जाकर…
जब डूब चुका होता है
सरे राह चलते-चलते….
रौशनी की किरचें
कुछ छोड़कर नहीं जातीं…
कुछेक मुट्ठी बंद
अहसास
होने और न होने के
भ्रमजाल हैं।

3

सुर्ख़रु हो रही कूचे की धूप
अंदाज़े से मापकर
बढ़ाती है अपने पाँव
सर्द दीवारों की ओर…

हसरत से ताकती हैं दीवारें
और समेट लेती हैं क़तरे दर क़तरे की
सुखन…
कड़कती सर्दियों का इत्मिनान
बख़ूब! परखा है मुद्दतों।

4

इक नदी स्वयं कल्पना में,
कोर तक सूखी हुई है।
द्वंद्व का विन्यास करती,
तल-अतल को चीरती है।

कंकड़ों से बिंध गया मन पाँव पंकिल पूछते हैं,
ये नदी आख़िर कहाँ जाकर उदधि को चूमती है।

घोर संकट में घिरी अस्तित्व का आधार ढूँढे
पिघलते हिमखण्ड की आकुल व्यथा महसूसती है

द्वंद्व का विन्यास करती तल-अतल को चीरती है।