यह पत्र लिंकन ने राष्ट्रपति बनने से बहुत पूर्व अपनी युवावस्था में लिखा था।

स्प्रिंग-फ़ील्ड,
7 मई, 1837

मित्र मेरी,

प्रस्तुत पत्र से पहले मैंने दो चिट्ठियाँ लिखनी आरम्भ कीं। दोनों से ही मैं सन्तुष्ट न हो सका और मैंने उन्हें तुम्हारे तक पहुँचने से पहले ही फाड़ डाला। पहली चिट्ठी तो काफ़ी गम्भीर नहीं बन पायी थी और दूसरी में गम्भीरता की ज़्यादती हो गई थी। अब यह चिट्ठी जैसी भी लिखी जाएगी, मैं इसे भेज दूँगा।

स्प्रिंग-फ़ील्ड का जीवन बड़ा ही रूखा है। कम से कम मेरे लिए तो वह ऐसा ही है। मैं यहाँ भी उतना ही अकेलापन महसूस करता हूँ जितना कि मैं अपने जीवन में और सभी स्थानों पर करता रहा हूँ। जब से मैं यहाँ आया हूँ, केवल एक स्त्री ने मुझसे बातचीत की है… वह भी बात न करती यदि वह मेरे पास आने को मजबूर न होती। मैं अब तक एक बार भी गिर्जे नहीं गया और शायद जल्दी ही जाऊँगा भी नहीं। मैं सबसे दूर-दूर रहता हूँ, क्योंकि मैं नहीं जानना चाहता कि मुझे दूसरों से किस तरह का व्यवहार करना चाहिए।

तुम्हारे स्प्रिंग-फ़ील्ड पर रहने के विषय में जो बातें हम दोनों में हुई थीं, उन पर मैं अक्सर विचार किया करता हूँ। मुझे डर है कि तुम यहाँ सन्तुष्ट नहीं रह सकोगी। यहाँ बग्घियों की भारी धूमघाम रहती है। तुम उन्हें नित्य देखोगी पर स्वयं वैसी शान-शौक़त नहीं कर सकोगी। तुम्हें तरसना होगा, क्योंकि तुम्हें ग़रीब बनकर रहना होगा, और अपनी ग़रीबी को छुपाने के साधन भी तुम्हारे पास नहीं होंगे। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम यह सब धैर्यपूर्वक सह सकती हो? चाहे जो भी स्त्री मेरी जीवन-धारा में अपनी जीवनधारा मिलाए—यदि कभी किसी ने ऐसा किया तो—मैं उसे प्रसन्न और सन्तुष्ट बनाने में कोई कोर-कसर उठा न रखूँगा, और यदि मैं ऐसा न कर सका, तो यह मेरे लिए सबसे अधिक दुःख और दुर्भाग्य की बात होगी। तुम्हारे साथ रहकर मैं आज की अपेक्षा बहुत अधिक सुखी जीवन बिताऊँगा, पर यदि मैंने तुम में असन्तोष की झलक देखी तो मेरा सारा सुख धूल में मिल जाएगा। वह जो तुमने कहा था शायद मज़ाक़ में कहा हो, और हो सकता है मैंने ही तुम्हें ग़लत समझा हो। यदि ऐसा है तो अच्छा हो हम इस बात को भूल जाएँ। पर, अगर मैंने तुम्हें ठीक समझा हो, तो मैं बहुत चाहूँगा कि तुम फ़ैसला करने से पहले गम्भीरता से सोच लो। यदि तुमने मेरे साथ रहने का फ़ैसला किया तो जो कुछ भी मैंने कहा है, उसका अक्षरशः पालन करूँगा। मेरी तो राय है तुम ऐसा न ही करो तो अच्छा है। तुम्हें कठोर जीवन का अभ्यास नहीं है और यहाँ का जीवन तुम्हारी आज की कल्पना से कहीं अधिक कठिन हो सकता है। मैं जानता हूँ तुम किसी भी विषय पर ठीक-ठीक विचार कर सकती हो और यदि तुम यह निर्णय करने से पहले ही गहराई से सब सोच-समझ लो, तो मैं तुम्हारे फ़ैसले के अनुसार चलने को तैयार हूँ।

यह पत्र पाकर तुम्हें एक ख़ूब लम्बा पत्र मुझे लिखना चाहिए! तुम्हें और कुछ तो नहीं करना पड़ता। जो तुम लिखोगी, वह लिखे जाने पर चाहे तुम्हें रुचिकर मालूम न हो पर मेरे लिए वह इस ‘व्यस्त उजाड़’ में एक बढ़िया साथी का काम देगा।*

—तुम्हारा
लिंकन

*मेरी और लिंकन का विवाह नहीं हुआ। बाद में जिस व्यक्ति से मेरी का विवाह हुआ, वह जीवन-भर लिंकन का प्रमुख राजनीतिक विरोधी बना रहा।

Book about Abraham Lincoln:

Previous articleमैं आदमी नहीं हूँ
Next articleजिस दिशा में मेरा भोला गाँव है
पोषम पा
सहज हिन्दी, नहीं महज़ हिन्दी...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here