अगर,
प्रेम के अभिलाषी न होकर
कालांश को भी प्रेमिल हुए थे
तब उस क्षण.. ईश्वर तुम्हें स्पर्श कर रहा था।

अगर,
प्रेम आकर गुज़र भी गया
तुम्हें भान तक न हुआ कभी
तब ईश्वर की करवट में.. समय-चक्र उनींदा हो रहा था।

अगर,
प्रेम बिन दस्तक के पसर गया था
देह की संवेदी परतों में कहीं
तब ईश्वर उसे.. अपनी पोरों से परख रहा था।

अगर,
प्रेम अनहद नाद-सा झूम रहा था
आत्मा की अन्तिम गलन तक कहीं
तब ईश्वर… तुम्हारे ललाट पर होंठ रख रहा था

अगर
प्रेम भीड़ का अग्रणी होकर
आयोजित उपहास-कक्ष का वन्दनवार था कहीं
तब ईश्वर… अधिक दयालु होने के शब्दार्थ बाँट रहा था।

अगर,
प्रेम पीड़ा बनकर उभरने लगा था
आँखों की लालिमा में कहीं
तब ईश्वर तुम्हें.. जीते जी एक पुनर्जन्म दे रहा था

प्रेम की हर अवस्था
ईश्वर को.. तुम्हारा समीपवर्ती पड़ोसी बनाती है।

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मंजुला बिष्ट
बीए. बीएड. गृहणी, स्वतंत्र-लेखन कविता, कहानी व आलेख-लेखन में रुचि उदयपुर (राजस्थान) में निवासइनकी रचनाएँ हंस, अहा! जिंदगी, विश्वगाथा, पर्तों की पड़ताल, माही व स्वर्णवाणी पत्रिका, दैनिक-भास्कर, राजस्थान-पत्रिका, सुबह-सबेरे, प्रभात-ख़बर समाचार-पत्र व हस्ताक्षर, वेब-दुनिया वेब पत्रिका व हिंदीनामा पेज़, बिजूका ब्लॉग में भी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

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