जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े
जहाँ न पटरी माथा फोड़े
जहाँ न अक्षर कान उखाड़ें
जहाँ न भाषा ज़ख़्म उभारे

ऐसा हो स्कूल हमारा!

जहाँ अंक सच-सच बतलाएँ
जहाँ प्रश्न हल तक पहुँचाएँ
जहाँ न हो झूठ का दिखाव्वा
जहाँ न सूट-बूट का हव्वा

ऐसा हो स्कूल हमारा!

जहाँ किताबें निर्भय बोलें
मन के पन्ने-पन्ने खोलें
जहाँ न कोई बात छुपाए
जहाँ न कोई दर्द दुखाए

ऐसा हो स्कूल हमारा!

जहाँ न मन में मन-मुटाव हो
जहाँ न चेहरों में तनाव हो
जहाँ न आँखों में दुराव हो
जहाँ न कोई भेद-भाव हो
जहाँ फूल स्वाभाविक महके
जहाँ बालपन जी भर चहके

ऐसा हो स्कूल हमारा!

'खिड़की में खड़ी नन्ही लड़की - तोत्तो चान'

Book on Girda:

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गिरीश चन्द्र तिवारी 'गिर्दा'
(10 सितम्बर 1945 – 22 अगस्त 2010)उत्तराखण्ड के पटकथा-लेखक, गीतकार, गायक, जनकवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में आपने अपनी कविताओं व गीतों के माध्यम से उत्तराखंडी जनमानस को एकत्रित करने में पूर्ण सफलता पायी।

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