हम उस यात्रा में
अकेले क्यों रह जाएँगे?

साथ क्यों नहीं आएगा हमारा बचपन,
उसकी आकाश-चढ़ती पतंगें
और लकड़ी के छोटे-से टुकड़े को
हथियार बना कर दिग्विजय करने का उद्गम—
मिले उपहारों और चुरायी चीज़ों का अटाला?

क्यों पीछे रह जाएगा युवा होने का अद्भुत आश्चर्य,
देह का प्रज्वलित आकाश,
कुछ भी कर सकने का शब्दों पर भरोसा,
अमरता का छद्म,
और अनन्त का पड़ोसी होने का आश्वासन?

कहाँ रह जाएगा पकी इच्छाओं का धीरज
सपने और सच के बीच बना
बेदरोदीवार का घर
और अगम्य में अपने ही पैरों की छाप से बनायी पगडण्डियाँ?

जीवन भर के साथ-संग के बाद
हम अकेले क्यों रह जाएँगे उस यात्रा में?

जो साथ थे वे किस यात्रा पर
किस ओर जाएँगे?

वे नहीं आएँगे हमारे साथ
तो क्या हम उनके साथ
जा पाएँगे?

Book by Ashok Vajpeyi:

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अशोक वाजपेयी
अशोक वाजपेयी समकालीन हिंदी साहित्य के एक प्रमुख साहित्यकार हैं। सामाजिक जीवन में व्यावसायिक तौर पर वाजपेयी जी भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक पूर्वाधिकारी है, परंतु वह एक कवि के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं। उनकी विभिन्न कविताओं के लिए सन् १९९४ में उन्हें भारत सरकार द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। वाजपेयी महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के उपकुलपति भी रह चुके हैं। इन्होंने भोपाल में भारत भवन की स्थापना में भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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