अकेली औरत
ख़ुद से ख़ुद को छिपाती है।
होंठों के बीच क़ैद पड़ी हँसी को खींचकर
जबरन हँसती है
और हँसी बीच रास्ते ही टूट जाती है…

अकेली औरत का हँसना
नहीं सुहाता लोगों को।
कितनी बेहया है यह औरत
सिर पर मर्द के साए के बिना भी
तपता नहीं सिर इसका…

मुँह फाड़कर हँसती
अकेली औरत
किसी को अच्छी नहीं लगती,
जो खुलकर लुटाने आए थे हमदर्दी
वापस सहेज लेते हैं उसे
कहीं और काम आएगी यह धरोहर!

वह अकेली औरत
कितनी ख़ूबसूरत लगती है…
जब उसके चेहरे पर एक उजाड़ होता है

आँखें खोयी-खोयी-सी कुछ ढूँढती हैं,
एक वाक्य भी जो बिना हकलाए बोल नहीं पातीं
बातें करते-करते अचानक
बात का सिरा पकड़ में नहीं आता,
बार-बार भूल जाती हैं—अभी-अभी क्या कहा था
अकेली औरत का चेहरा
कितना भला लगता है…

जब उसके चेहरे पर ऐसा शून्य पसरा होता है
कि जो आपने कहा, उस तक पहुँचा ही नहीं।
आप उसे देखें तो लगे ही नहीं
कि साबुत खड़ी है वहाँ।
पूरी की पूरी आपके सामने खड़ी होती है
और आधी-पौनी ही दिखती है।
बाक़ी का हिस्सा कहाँ किसे ढूँढ रहा है,
उसे ख़ुद भी मालूम नहीं होता।
कितनी मासूम लगती है ऐसी औरत!
हँसी तो उसके चेहरे पर
थिगली-सी चिपकी लगती है,
किसी ग़ैरज़रूरी चीज़ की तरह
हाथ लगाते ही चेहरे से झर जाती है…

सुधा अरोड़ा की कविता 'अकेली औरत का रोना'

Book by Sudha Arora:

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