‘Amaltas Par Phool Aa Gaye’, a poem by Sanjay Vidrohi

दोनों और सड़क के तुमने
कई इमारत, बनी अधबनी देखी होंगी
खुले, अधखुले कई नये दरवाज़े होंगे
धुली-बेधुली, धूल सनी कारें भी होंगी
और कारों का एक ठिठककर रुकता-चलता रेला होगा
कई तरह का शोर-शराबा कानों में से गुज़र रहा है
हर कोई खोया-उलझा-सा स्टेरिंग पर थपकी देता-
कई मर्तबा सुने-सुनाये गानों में से गुज़र रहा है
फिर भी अपने मन के भीतर ऊहापोह के बीच झूलता-
कोई बहुत अकेला होगा
उसे मिले हो?
कभी सुनी हैं उसकी बातें?
उसके मन की कभी सुनी है?
अपने मन की कभी सुना पाए हो उसको?
कितने दिन से गुज़र रहे हो इस रस्ते से ?
आगे-पीछे, चलते-चलते एक-दूजे के-
चले कहाँ से? कहाँ आ गए? कुछ मालूम है?
दिन, मौसम और साल गुज़रते चले गए हैं
स्कूलों को जाते बच्चे नयी क्लास में चले गए हैं
माँ की खाँसी, पहले से भी घनी हो गई
और जीवन में पिता नाम की कमी हो गई
समझ अचानक उम्र से ज़्यादा बड़ी हो गई
कोई शायद देख रहा है, तुमको कब से
तुमको अपने डर से बाहर खींच रहा है
और अपने भीतर की सारी दया, प्रेम, ममता, करुणा से बिना शर्त के
तेरे अहम् को सींच रहा है
नज़र उठाकर कभी देखना, काला चश्मा हटा के सर से
मौसम के परदे पर देखो रंग नये से उतर रहे हैं
सड़क किनारे खड़े पेड़ भी बदल रहे हैं
अमलतास पर फूल आ गए…

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संजय विद्रोही
कवि एवं कहानीकार sanjayvidrohi.wordpress.com

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