फिर भी कभी चला जाऊँगा उसी दरवाज़े तक अनायास जैसे,
उस अँधियारे गलियारे में कोई अब तक रहता हो।
फिर भी, दीवार की कील पर अटका दूँगा नया कैलेण्डर,
किसी को यों ही पत्र लिख दूँगा—मैं बीमार हूँ
सीने पर अधखुली किताब रखकर सो जाऊँगा
चाय बर्फ़ हो रही है कहकर, कोई मुझे जगाए नहीं
नन्हा-सा कोई बच्चा मेरे बिस्तर पर आए नहीं
मैं बहुत बीमार हो गया हूँ!

धीमी चलती हुई किसी ट्राम पर चढ़ जाता हूँ,
पढ़ता चलता हूँ दुकानों के साइनबोर्ड,
फ़िल्मों के पोस्टर, नियॉन-अक्षरों में बाँधे गए गीत,
किसी की आँखों में क्या-क्या देखता रहता हूँ,
किसी को अनदेखे ही मुस्कुराता हूँ…
कोई अनलिखी कविता दुहराता हूँ। शाम की रोशनियाँ
दस-मंज़िले मकानों से उतरती हुई
मेरी बीमार बाँहों से लिपट जाती हैं।

फ़ुटपाथों पर रुके हुए लोगों की लगातार भीड़
मुझसे शहराह पूछती है। मैं—
सबको ग़लत गलियों में ले जाता हूँ
(यही मेरी क़िस्मत है!) नहीं शरमाता हूँ!
फिर किसी बस-स्टॉप के पास रुका रहता हूँ
रुका हुआ हूँ
नींद में हूँ। फिर भी अनायास कोई मुझे पुकारेगा,
नक़ाब कितने भी लगाए फिरूँगा, लेकिन
वह मुझे पहचानेगा। मुझे वापस बुलाने के सिवा
उसने कोई काम नहीं सीखा है।

Book by Rajkamal Chaudhary: